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Image: Scientist gave warning for dehradun

देहरादून में धधक रही है ढाई सौ किलोमीटर जमीन, वैज्ञानिकों ने दी बड़े भूकंप की चेतावनी

देहरादून में धधक रही है ढाई सौ किलोमीटर जमीन, वैज्ञानिकों ने दी बड़े भूकंप की चेतावनी

लीजिए अब देहरादून के लिए भू वैज्ञानिकों की टीम ने बड़ी चेतावनी दी है। जी हां हाल ही में एक खुलासा किया गया है। इसमें बताया गया है कि देहरादून से टनकपुर के बीच ढाई सौ किलोमीटर क्षेत्रफल में जमीन लगातार सिकुड़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि एक साल में ये जमीन 18 मिलीमीटर के हिसाब से सिकुड़ रही है। नेशनल सेंटर ऑफ सिस्मोलॉजी ने ये रिपोर्ट पेश की है। हम आपको पहले भी बता चुके हैं कि उत्तराखंड के लिए कई बार वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की हैं। मंगलवार को नेशनल सेंटर ऑफ सिस्मोलॉजी के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत ने इस शोध को देहरादून में आयोजित डिजास्टर रेसीलेंट इंफ्रांस्ट्रक्चर इन दि हिमालयाज: ऑपोर्च्यूनिटी एंड चैलेंजेस वर्कशॉप में पेश किया। इस रिपोर्ट में कई बड़ी और हैरान कर देने वाली बातें बताई गई हैं।

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डॉक्टर गहलोत का कहना है कि साल 2012 से 2015 के बीच देहरादून के पास मोहंड से टनकपुर के बीच 30 जीपीएस यानी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम लगाए गए थे। इस दौरान इसका बारीकी से अध्ययन किया गया। अध्ययन पर पता चला कि ये पूरा भूभाग 18 मिलीमीटर की दर से सिकुड़ता जा रहा है। इस सिकुड़न की वह से धरती के भीतर ऊर्जा का भंडार तैयार हो रहा है। वैज्ञािकों ने चेतावनी जारी की है कि कभी भी इस पूरे भू-भाग में सात से आठ रिक्टर स्केल का भूकंप आ सकता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एक वक्त ऐसा भी आएगा जब इस धरती की सिकुड़न आखिरी लेवल पर होगी। इसके बाद ये ऊर्जा भूकंप के रूप में बाहर निकल सकती है। इसी तरह की हरकत नेपाल में भी देखी गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नेपाल में धरती के सिकुड़ने की दर इससे ज्यादा है।

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नेपाल में 21 मिलीमीटर के हिसाब से धरती सिकुड़ रही है। साल 2015 में भी नेपाल में 7.8 रिक्टर स्केल का बड़ा भूकंप आ चुका है। हालांकि वैज्ञानिकों ने ये भी कहा कि इस बात का अदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि धरती का सिकुड़ना का आखिरी दौर कर होगा। लेकिन इतना जरूर है कि जीपीएस से धरती के बदलाव और भूकंप की आशंकाओं का अध्ययन किया जा रहा है। नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत का कहना है कि करीब 250 किलोमीटर धरती का हिस्सा भूकंपीय ऊर्जा का लॉकिंग जोन बन रहा है। अब तक सबसे ज्यादा लॉकिंग जोन चंपावत, टिहरी-उत्तरकाशी और आगराखाल में पाए गए हैं। खैर इतना जरूर है कि उत्तराखंड के लिए ये खबर सावधानी की तरह है। वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती से लगातार खिलवाड़ हो रहा है और इसका नतीजा कुछ भी हो सकता है।

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