उपेक्षा, संघर्ष और अंतिम सांस तक राज्यहित में आन्दोलन..... 'शहीद बाबा बमराड़ा' को शत शत नमन ! (Salute to Baba Bamrara)
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उपेक्षा, संघर्ष और अंतिम सांस तक राज्यहित में आन्दोलन..... 'शहीद बाबा बमराड़ा' को शत शत नमन !

उपेक्षा, संघर्ष और अंतिम सांस तक राज्यहित में आन्दोलन..... 'शहीद बाबा बमराड़ा' को शत शत नमन !

उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में प्रथम पंक्ति के नायक की भूमिका निभाने वाले वयोवृद्ध आंदोलनकारी 80 वर्षीय मथुरा प्रसाद बमराड़ा उर्फ़ बाबा बमराड़ा का देर रात दून अस्पताल में निधन हो गया। बाबा बमराड़ा पिछले काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे। यहाँ सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि अग्रणी उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों में गिने जाने वाले बाबा बमराड़ा के आखिरी वक्त पर उनके पुत्र के अलावा उनके साथ कोई नहीं था। यहाँ तक कि बाबा बमराड़ा का अंतिम संस्कार चंदा जुटाकर किया गया। सीएमओ देहरादून द्वारा एंबुलेंस की व्यवस्था की गयी और पुलिस द्वारा बाकी का इंतजाम किया गया। यहाँ सबसे हैरानी की बात यह भी रही है कि लंबे समय से अस्पताल में भर्ती बाबा बमराड़ा की कुशलक्षेम पूछने कोई नेता या जनप्रतिनिधि नहीं पहुंचा। बाबा बमराड़ा को थोडा बहुत सम्मान देते हुए शहर कोतवाल बीडी जुयाल व कुछ अन्य लोगों ने चंदा जमा कर बाबा बमराड़ा के अंतिम संस्कार के लिए उनके पुत्र की मदद की।

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हेमेंद्र बमराड़ा जो कि बाबा बमराड़ा के पुत्र हैं, ने बताया कि बाबा बमराड़ा पिछले 15 माह से अस्पताल में भर्ती थे। बरमाड़ा 13 जून 2016 को शहीद स्थल पर आमरण अनशन पर बैठे थे। राज्य आंदोलनकारियों की घनघोर उपेक्षा और राज्य के मुद्दों को लेकर उनकी लड़ाई अंतिम समय तक जारी रही। शहीद स्थल में बाबा बमराड़ा का आमरण अनशन उनके जीवन की अंतिम लड़ाई थी। इसके बाद उन्हें दून अस्पताल में भर्ती किया गया। जहां ढाई माह से ज्यादा समय तक वह अनशन पर रहे और सिर्फ ग्लूकोज के सहारे बाबा बमराड़ा ने इस लड़ाई को अंतिम सांस तक जारी रखा। बाबा बमराड़ा की पढाई-लिखाई में बहुत अधिक रूचि नहीं थी, उन्हें शौक था एक्टिंग का तो वो अपना ये शौक लेकर तब मुंबई पहुँच गये थे वो वहां तब तमाम स्टूडियो में इधर से उधर भटकते रहे पर उन्हें कहीं भी काम नहीं मिला और धीरे धीरे उनके पास जो धन था वो भी खत्म होने लगा।

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निराश होकर वो दिल्ली 1969-1970 में वापस आ गये जहाँ उनके पिता ने उनके लिए चश्मों की एक दूकान खोल दी पर यहाँ भी बदनसीबी ने उनका साथ नहीं छोड़ा और उनकी दुकान आग लगने के कारण ख़ाक हो गयी। उस समय वह दिल्ली में उत्तराखंड की कई संस्थाएं संस्कृति और लोकमंचों पर काम कर रही थीं, इस समय रेडियो पर एक प्रसंग आया जिसमें गहने की चोरी करने वाले को गढ़वाल के जिले का बताया गया, इस पर उत्तराखंड के बुद्धिजीवियों ने कड़ा ऐतराज जताया और दिल्ली में जगह जगह आन्दोलन शुरू कर दिए, जिसके बाद तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने इस पर नाराजगी जतायी और फिर रडियो चेनल को इस बाबत माफी मांगनी पड़ी। यही वह घटना थी जिसने बाबा बमराड़ा के मन में उत्तराखंड के पृथक राज्य की भावना की अलख जगा दी थी। और वो फिर अलग राज्य के मांग को लेकर सक्रिय हो गये और उन्होंने पूरे देश और राज्य में इसके लिए आन्दोलन तेज कर दिए थे।

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यहाँ आपको यह भी बताना चाहेंगे कि उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी बाबा बमराड़ा का जन्म 1941 में पौड़ी गढ़वाल के घुड़दौड़ी के निकट पंण्या गांव में हुआ था। वह जनसंघ से लेकर उत्तराखंड क्रांति दल व तमाम आंदोलनकारी संगठनों से जुड़े रहे। कई बार वह जेल गए। कई दिनों तक अनशन किया। यूं कहा जा सकता कि उन्होंने अपनी पूरी उम्र आंदोलन के नाम कर दी। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि बाबा बरमाड़ा ने उत्तराखंड राज्य निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। उनके निधन को सीएम ने प्रदेश के लिए अपूरणीय क्षति बताया। बाबा बमराड़ा के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए हरिद्वार भेजने के लिए भी जनपद के मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. वाईएस थपलियाल ने वाहन की व्यवस्था करवाई। राज्य समीक्षा अंतिम सांस तक राज्यहित के लिए आन्दोलन में रत "शहीद बाबा बमराड़ा" को शत शत नमन करता है।

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