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Image: 25 may birthdate of Shri dev Suman of Uttarakhand

25 मई - 'श्रीदेव सुमन' जयंती... जिनके 84 दिनों के आमरण अनशन की कथा रोंगटे खड़े कर देती है

25 मई - 'श्रीदेव सुमन' जयंती... जिनके 84 दिनों के आमरण अनशन की कथा रोंगटे खड़े कर देती है

आज का दिन उत्तराखंड के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। आज ही के दिन, 25 मई को, उत्तराखंड के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक श्रीदेव सुमन ने जन्म लिया था। सुमन 1930 में 14 साल की उम्र में ही महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े थे, जिसके लिए उन्हे जेल जाना पड़ा था। उसके बाद उन्होंने टिहरी रियासत की सामंतशाही और राजशाही नीतियों के विरोध में आंदोलन प्रारंभ किया। 1940 में राजा की नीतियों का विरोध करने पर उन्हें जेल भेजा गया। उनके खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज किये गये जिस पर सुमन ने ऐतिहासिक आमरण-अनशन शुरू कर दिया था। इतिहास के शायद सबसे लम्बे 84 दिनों के आमरण अनशन के बाद वे राजा की नीतियों का विरोध करते हुए 25 जुलाई 1944 को शहीद हो गये लेकिन उनका बलिदान से उत्तराखंड की जनता में आन्दोलन का ऐसा उन्माद उत्पन्न हुआ कि 15 जनवरी 1948 को टिहरी सियासत राजशाही से मुक्त हो गयी। श्रीदेव सुमन का कहना था कि "मैं अपने शरीर के कण-कण को नष्ट हो जाने दूंगा लेकिन टिहरी रियासत के नागरिक अधिकारों को कुचलने नहीं दूंगा"। सुमन की इस बात पर राजा ने दरबार और प्रजामण्डल के बीच सम्मानजनक समझौता कराने का संधि प्रस्ताव भी भेजा, लेकिन राजा के दरबारियों ने उसे खारिज कर इनके पीछे पुलिस और गुप्तचर लगवा दिये।
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27 दिसम्बर, 1943 के दिन चम्बाखाल में सुमन को गिरफ्तार कर दिया गया और 30 दिसम्बर को टिहरी जेल भिजवा दिया गया, जहां से इनकी मृत देह ही बाहर आ सकी। 30 दिसम्बर 1943 से 25 जुलाई 1944 तक 209 दिन सुमन ने टिहरी की जेल में बिताये। टिहरी जेल उस समय की सबसे नारकीय जेल थी। उस पर झूठे मुकदमे और फर्जी गवाहों के आधार पर 31 जनवरी, 1944 को दो साल का कारावास और 200 रुपया जुर्माना लगाकर इन्हें सजायाफ्ता मुजरिम बना दिया गया। इस दुर्व्यवहार से खीझकर सुमन ने 29 फरवरी से 21 दिन का उपवास प्रारम्भ कर दिया, जिससे जेल के कर्मचारी कुछ झुके, लेकिन जब महाराजा से कोई बातचीत नहीं कराई गई तो इन्होंने उसकी मांग की, लेकिन बदले में बेंतों की सजा इन्हें मिली। किसी प्रकार का उत्तर न मिलने पर सुमन ने 3 मई, 1944 से इतिहास का सबसे कठिन और नारकीय आमरण अनशन शुरु कर दिया। श्रीदेव सुमन पर कई प्रकार के पाशविक अत्याचार किये गये, सुमन को पागल साबित करने की कोशिश की गयी और उनके मनोबल को डिगाने की कोशिश की गयी। लेकिन पहाड़ का ये बेटा अपनी बात पर कायम रहा। जब इनके अनशन के समाचार उत्तराखंड की जनता तक पहुंचे तो जनता आक्रोशित हो गयी।
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shridev suman jail where he lived at the last time
फ़ोटो पुरानी टिहरी जेल जहां श्रीदेवसुमन जी ने अपना आखिरी समय बिताया
रियासत ने यह झूठी अफवाह फैला दी कि श्रीदेव सुमन ने अनशन समाप्त कर दिया है और 4 अगस्त को महाराजा के जन्मदिन पर इन्हें रिहा कर दिया जायेगा। उधर अनशन से सुमन की हालत बिगड़ती चली गई और जेल के अत्याचार भी बढ़ते चले गए। जेल के कर्मियों ने यह प्रचारित करवा दिया कि सुमन को न्यूमोनिया हो गया है, लेकिन इन्हें कुनैन के इन्ट्रावेनस इन्जेक्शन लगाये गये। जिससे इनके पूरे शरीर में पानी की कमी हो गयी... उत्तराखंड का ये बेटा पानी-पानी चिल्लाता रहा लेकिन पानी की एक बूँद के बदले इनसे लिखित तौर पर अपना अनशन वापस लेने को कहा गया। सुमन ने पानी पीने से भी इनकार कर दिया। 20 जुलाई की रात से उन्हें बेहोशी आने लगी और 25 जुलाई 1944 को शाम करीब 4 बजे इस अमर सेनानी ने अपनी मातृभूमि, अपने देश और अपने आदर्शों के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी। क्रूरता की हद देखिये कि इसी रात को जेल प्रशासन ने इनकी लाश एक कम्बल में लपेट कर भागीरथी और भिलंगना के संगम पर तेज धरा में फेंक दी। सुमन की शहादत का जनता पर जबरदस्त असर हुआ और राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह शुरू हो गया। सुमन के बलिदान के बाद जनता के आन्दोलन ने टिहरी रियासत को प्रजामण्डल को वैधानिक कराने पर मजबूर कर दिया। जनता ने देवप्रयाग, कीर्तिनगर और टिहरी पर अधिकार कर लिया और यहाँ प्रजामण्डल के पहले मंत्रिपरिषद का गठन हुआ। जिसके बाद 1 अगस्त 1949 को टिहरी गढ़वाल रियासत का भारत गणराज्य में विलय हो गया।
स्वाधीनता-हितरधीता से दूं झुका जगदीश को,
मां के पदों में सुमन सा रख दूं समर्पण शीश को। - 'श्रीदेव सुमन'

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