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Image: Pahadi boy hemant get 88th rank in civil services exam

जब देवभूमि के पहाड़ों से निकली ज्ञान की गंगा...तो बह गए सारे महारथी...

जब देवभूमि के पहाड़ों से निकली ज्ञान की गंगा...तो बह गए सारे महारथी...

पहाड़ में क्या दम है ये पिछले कई दिनों से आप देख रहे होंगे। हाल ही में उत्तराखंड बोर्ड का रिजल्ट आया तो पहाड़ों में रहने वाली आइशा रावत ने सभी को पीछे छोड़ दिया और साबित कर दिया कि पहाड़ में रहने वाले किस कुशाग्र बुद्धि के होते हैं। ऐसा ही एक बार फिर से हुआ है। इस बार तो जो हुआ है वो हर किसी के लिए प्रेरणादायक है। पहाड़ की मुश्किल और कठिन पगडंडियों से निकलकर हेमंत सती ने दुनिया के सामने नई मिसाल पेश कर दी है। इस पहाड़ी लड़के ने ये भी साबित कर दिया कि सफलता के लिए सिर्फ अंग्रेजी की जानकारी जरूरी नहीं है। अगर आप मेहनत करते हैं और आप हिंदी के जानकार हैं तो कोई भी आपकी सफलता में रोड़ नहीं बन सकता। क्या आप जानते हैं कि इस लड़के ने अब क्या किया है। सरकारी स्कूल से हिंदी मीडियम के इस छात्र ने हिंदी में सिविल सेवा की परीक्षा दी। सिर्फ परीक्षा ही नहीं दी बल्कि 88वीं रैंक भी हासिल की।

हेमंत को ये रैंक ऑल ओवर 88वीं मिली है। इसके साथ ही हेमंत हिंदी मीडियम से सिविल सेवा परीक्षा देने वाले सफल उम्मीदवारों में टॉप पर हैं। अब आपको बताते हैं कि हेमंत आखिर कहां के रहने वाले हैं और किस तरह से उन्होंने सीढ़ी दर सीढ़ी सफलता हासिल की। दरअसल हेमंत का परिवार मूल रूप से चमोली के कोठली गांव का रहने वाला है। हेमंत के पिता कांता प्रसाद राजकीय इंटर कॉलेज हरबर्टपुर में लेक्चरार हैं। हेमंत की मां सत्येश्वरी देवी ग्रहणी हैं। फिलहाल हेमंत का परिवार देहरादून के मोहकमपुर में रहता है। हेमंत का बचपन पहाड़ों में बीता है। उन्होंने 12 वीं की पढ़ाई चौखुटिया अल्मोड़ा से की है। इसके अलावा वो 12 वीं के बाद की पढ़ाई के लिए देहरादून आए। साल 2009 में हेमंत ने डीबीएस से बीएससी किया। इसके बाद हेमंत ने अपने दिमाग में खाका खींच लिया था कि सफल होना है तो मेहनत करनी पड़ेगी। अंग्रेोजदी के रूप में बाधा सामने आई, लेकिन हिंदी को उन्होंने हथियार बना लिया।

ऐसा नहीं है कि हमंत को सिविल सेवा में ये कामयाबी एक ही बार में हासिल हुई है। अथक परिश्रम, अटूट मेहनत और लगन के दम पर हेमंत कभी नहीं हारे। 4 बार उन्हें इस मामले में असफलता हासिल हुई। लेकिन आखिरकार पांचवीं बार उन्होंने जीत हासिल कर ली। इसके साथ ही ये भी साबित कर दिया कि हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती। इससे पहले हेमंत तीन बार मुख्य परीक्षा और एक बार इंटरव्यू तक पहुंच गए थे। बीते साल उनका राजस्थान पीसीएस में जिला पर्यटन अधिकारी के तौर पर सलेक्शन भी हुआ। लेकिन हेमंत कहां मानने वाले थे। उन्होंने वो नौकरी ज्वॉइन नहीं की, वो लगातार मेहनत करते रहे। आखिरकार सपना साकार हुआ और जो रैंक उन्हें मिली, उसके दम पर वो आइएएस बनने की राह पर हैं। पढ़ाई के अलावा हेमंत समसामयिक विषयों पर लेख लिखते रहे हैं।

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