पौड़ी गढ़वाल: थलीसैंण ब्लॉक में दर्दनाक सड़क हादसा हो गया। बुंखाल मेले से लौट रहे श्रद्धालुओं की कार अचानक अनियंत्रित होकर गहरी खाई में जा गिरी। हादसे में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीन श्रद्धालु गंभीर रूप से घायल हो गए। सभी घायलों को प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज हेतु एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया है।
Two people died in Pauri Garhwal road accident
जानकारी के अनुसार पौड़ी गढ़वाल जिले के थलीसैंण ब्लॉक में भीषण सड़क हादसा हो गया। यह हादसा उस समय हुआ जब सभी श्रद्धालु पाबौ ब्लॉक स्थित प्रसिद्ध बूंखाल कालिंका मंदिर में आयोजित मेले से वापस लौट रहे थे। इस हादसे में दो लोगों की मौके पर मौत हो गई। पुलिस और स्थानीय प्रशासन द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार मृतकों की पहचान वीरेंद्र, पुत्र सरदार सिंह, उम्र 23 वर्ष, निवासी ग्राम टीला, पैठाणी और संतोष सिंह, पुत्र रघुवीर सिंह, उम्र 35 वर्ष, निवासी ग्राम टीला, थाना पैठाणी के रूप में हुई है।
घायलों को किया गया ऋषिकेश AIIMS रेफर
वहीं इस हादसे में गंभीर रूप से घायल हुए लोगों की पहचान सोहन सिंह, वीरेंद्र सिंह और सिताब सिंह के रूप में हुई है। घायलों में से वीरेंद्र सिंह और सिताब सिंह, रुद्रप्रयाग जिले के निवासी हैं। वाहन के खाई में गिरते ही स्थानीय ग्रामीणों और पुलिस ने मौके पर पहुंचकर रेस्क्यू अभियान शुरू किया। इन तीनों घायलों को को प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज हेतु एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया है।
कालिंका देवी मंदिर की लोक मान्यता
पाबौ ब्लॉक स्थित प्रसिद्ध बूंखाल कालिंका मंदिर में हर साल यह मेला आयोजित किया जाता है। इस मेले में दूर-दराज़ के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कालिंका देवी के दर्शन करने पहुंचते हैं। यह मंदिर क्षेत्र में आस्था, विश्वास और लोक संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, बहुत सालों पहले गाय चराते हुए बच्चों की शरारत के दौरान एक बालिका खड्ड में दब गई। बाद में कहा जाता है कि उसी बालिका ने देवी कालिंका का रूप धारण किया और गांव के प्रधान के सपने में प्रकट होकर मंदिर स्थापित करने का संदेश दिया। इसके बाद खड्ड के पास कालिंका देवी का मंदिर निर्मित किया गया।
देवी की दिव्य ध्वनि और पूजा परंपरा
ग्रामीणों का कहना है कि यह देवी गांव में किसी भी अनहोनी की सूचना पहले से आवाज देकर दे दिया करती थीं। गोरखा आक्रमण के समय भी उन्होंने लोगों को पहले ही आगाह किया। बाद में, गोरखाओं ने तंत्र से खड्ड में दबी देवी को उलटा कर दिया, जिसके बाद यह आवाजें आना बंद हो गईं। कालिंका मंदिर में वर्षों तक बड़ी संख्या में पशु बलि दी जाती थी। माना जाता था कि इससे देवी की कृपा प्राप्त होती है। हालांकि, वर्ष 2011 से पशु बलि पूरी तरह बंद कर दी गई है। अब मेले के दिन ग्रामीण ढोल-दमाऊं, निशाण और डोली लेकर मंदिर पहुंचते हैं और सात्त्विक पूजा-अर्चना करते हैं। यह परंपरा अभी भी पूरे उत्साह और भक्ति के साथ निभाई जाती है।