उत्तराखंड देहरादूनDehradun George Everest toll Contempt of Court

देहरादून: जॉर्ज एवरेस्ट रोड पर टोल! उच्च न्यायालय के आदेश की हो रही खुली अवहेलना? पढ़िए पूरी रिपोर्ट

George Everest Road Toll Controversy: HC ने कहा — सार्वजनिक सड़क पर नो-टोल लेकिन 77वें गणतंत्र दिवस पर संवैधानिक वादे के बीच सार्वजनिक सड़क पर हो रही ‘वसूली’ पर बड़ा सवाल..

George Everest toll: Dehradun George Everest toll Contempt of Court
Image: Dehradun George Everest toll Contempt of Court (Source: Social Media)

देहरादून: गणतंत्र दिवस के दिन हम संविधान की प्रतिज्ञाएँ दोहराते हैं — पर सवाल उठता है कि क्या हम कानून और न्यायालय के आदेशों का सम्मान कर रहे हैं? जॉर्ज एवरेस्ट (George Everest) एस्टेट-रूट को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक सड़क पर कोई टोल वसूला नहीं जाएगा। इसके बावजूद स्थानीय लोगों और सैलानियों ने बताया है कि उसी सार्वजनिक मार्ग पर निजी कंपनी द्वारा बैरियर लगाकर शुल्क वसूली जारी है।

Dehradun George Everest toll Contempt of Court?

इसका अर्थ सीधे-सीधे Contempt of Court का मामला बन सकता है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कहा है कि जॉर्ज एवरेस्ट सार्वजनिक सड़क पर टोल नहीं लिया जाएगा। फिर भी कई जगह निजी कंपनी बैरियर लगाकर वसूली कर रही है। जानें HC आदेश, सरकार की कार्रवाई और स्थानीयों की शिकायतें।

हाई कोर्ट के मूल आदेश का सारांश

हाई कोर्ट ने सुनवाई में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सड़कों पर टोल वसूलना वैधानिक नहीं है और जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट के सार्वजनिक हिस्सों पर किसी तरह की रोक-टोक की अनुमति नहीं दी गई है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जहाँ तक एस्टेट के भीतर पार्क/प्रवेश हेतु भाड़ा/एंट्री-फीस की बात है, वह अलग संवैधानिक और संविदागत मुद्दा है — पर सार्वजनिक मार्ग पर रोक व टोल अस्वीकार्य है। यह आदेश एक जनहित याचिका पर आया था जो स्थानीय लोगों ने दायर की थी।

एंट्री फी बनाम रोड-टोल

जिन्हें क्षेत्र संचालित करने का ठेका मिला है (रिचार्ज/एडवेंचर ऑपरेटरों से जुड़ी निजी कंपनी), उनका कहना है कि वे एस्टेट-अंदर जाने के लिए एंट्री-फीस लेते हैं और सड़क पर जो बैरियर है वह ट्रैफिक मैनेजमेंट के लिए है — न कि सार्वजनिक मार्ग पर वैधानिक टोल के तौर पर। राज्य पर्यटन विभाग ने भी जिला प्रशासन और एसएसपी को HC के आदेश के अनुपालन के निर्देश दिए जाने की सूचना दी है। फिर भी स्थानीयों का कहना है कि मार्ग पर ही वसूली जारी है और लोगों की आवाजाही बाधित हो रही है।

  • स्थानीय लोगों का रोष: ‘हमारी जेब काटी जा रही है’

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    स्थानीय निवासियों और आसपास के ग्रामों के लोगों का कहना है कि वे समझते हैं कि एस्टेट के अंदर कोई एंट्री-फीस ली जा सकती है, पर सार्वजनिक सड़क पर बैरियर लगाकर हर एक वाहन से पैसे वसूलना असहनीय है। कई लोगों ने हाई-कोर्ट के आदेश के बाद भी आवागमन पर पाबंदी और वसूली की घटनाएँ जारी रहने का आरोप लगाया है और प्रशासन से त्वरित हस्तक्षेप की मांग की है।

  • किन कानूनी धाराओं में आ सकता है मामला?

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    यदि हाई-कोर्ट का स्पष्ट आदेश होने के बावजूद किसी भी निजी एजेंसी/कंपनी द्वारा सार्वजनिक मार्ग पर बैरियर रखकर वसूली की जा रही है, तो यह न्यायालय की अवहेलना (Contempt of Court) के दायरे में आ सकता है। साथ ही, उस कंपनी के खिलाफ पुलिस व प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई की गुंजाइश बनती है—क्योंकि सार्वजनिक मार्गों पर रोक-टोक और अवैध वसूली जनसंवेदनशील और कानून-विरोधी है।

  • वर्तमान निर्देश और ऑन-ग्राउंड स्थिति

    Current instructions and on-the-ground situation
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    राज्य के पर्यटन विभाग ने उच्च न्यायालय के आदेश को लागू कराने के निर्देश जिलाधिकारी और पुलिस को भेजे जाने की पुष्टि की है। शासन-केंद्र से जिला प्रशासन को कहा गया है कि HC के आदेश के ठीक पालन को सुनिश्चित किया जाए। पर रिपोर्टों के मुताबिक ऑन-ग्राउंड पर कुछ स्थानों पर बैरियर और वसूली की शिकायतें बनी हुई हैं — यानी आदेश का लागू होना अभी चुनौतीपूर्ण दिख रहा है।

  • क्या होनी चाहिए त्वरित कार्रवाई

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    जिला प्रशासन और SSP तुरंत HC की प्रति के साथ उस स्थान पर जा कर बैरियर हटवाएं और वसूली रोकें।

    यदि निजी कंपनी ने एस्टेट प्रवेश पर वैध एंट्री-फीस तय की है तो उसे स्पष्ट-सीमा में लागू कराया जाए; पर सार्वजनिक सड़क से संबंधित कोई रोक या वसूली बर्दाश्त न की जाए।

    स्थानीय लोगों के लिए एक शिकायत-पोर्टल और काउंसलिंग/शिकायत-निवारण टीम बनाई जाए ताकि तात्कालिक परेशानियों का निस्तारण हो सके।

    यदि आदेश का उल्लंघन जारी रहा तो हाई-कोर्ट में Contempt पिटीशन दायर करने का विकल्प खुला रहे।