हरिद्वार: उत्तराखंड में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है। शिक्षा विभाग का वार्षिक बजट 12 हजार करोड़ रुपये से अधिक होने के बावजूद कई राजकीय बालिका इंटरमीडिएट कॉलेज आज भी प्राथमिक स्कूलों के भवनों में संचालित हो रहे हैं। कुछ स्कूलों को स्थापना के 13 साल बाद भी अपना भवन नहीं मिल पाया है, जबकि एक अन्य विद्यालय 20 साल से अधिक समय से अस्थायी व्यवस्था में चल रहा है।
Uttarakhand Schools Without Buildings Even After Years
शिक्षा विभाग की ओर से गुणवत्ता सुधार के नाम पर कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। दावा किया जा रहा है कि 840 से अधिक राजकीय विद्यालयों में हाइब्रिड मोड पर स्मार्ट और वर्चुअल कक्षाएं संचालित की जा रही हैं। आधुनिक आईसीटी तकनीक के जरिए देहरादून स्थित केंद्रीकृत स्टूडियो से विभिन्न स्कूलों में लाइव पढ़ाई कराई जा रही है। विभाग का कहना है कि इससे छात्रों को डिजिटल तकनीक से जोड़कर शिक्षा को सरल और रोचक बनाया जा रहा है। इसके अलावा कक्षा 9 की छात्राओं को साइकिल या प्रोत्साहन राशि देने की योजना, समग्र शिक्षा अभियान के तहत मुफ्त किताबों का वितरण और बालिका शिक्षा प्रोत्साहन योजना का संचालन हो रहा है। लेकिन इन योजनाओं के बीच बुनियादी ढांचे की कमी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
वर्षों बाद भी अपने भवन से वंचित स्कूल
हरिद्वार जिले के गुलाबशाहपीर स्थित राजकीय बालिका इंटर कॉलेज की स्थापना वर्ष 2013-14 में हुई थी। इस विद्यालय में वर्तमान में 127 छात्राएं अध्ययनरत हैं। हैरानी की बात यह है कि यह इंटर कॉलेज आज भी राजकीय प्राथमिक विद्यालय रामपुर के भवन में संचालित हो रहा है।
वर्ष 2006-07 में स्थापित राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, मंगलौर (नारसन ब्लॉक) में 210 छात्राएं अध्ययनरत हैं। यह विद्यालय राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय नंबर तीन में संचालित किया जा रहा है। करीब दो दशक बाद भी विद्यालय को अपना स्वतंत्र भवन नहीं मिल पाया है।
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, टाम्डा बन्हेडा में 82 छात्र अध्ययनरत हैं। उच्चीकरण वर्ष 2013-14 में हुआ, लेकिन वर्तमान में इसे राजकीय जूनियर हाईस्कूल टांडा बन्हेडा में संचालित किया जा रहा है।
वर्ष 2016-17 में उच्चीकृत राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मानकपुर आदमपुर में मात्र 14 छात्र अध्ययनरत हैं। यह स्कूल राजकीय प्राथमिक विद्यालय मानकपुर आदमपुर के भवन में संचालित हो रहा है। बताया जा रहा है कि अपना भवन न होने के कारण छात्र संख्या भी नहीं बढ़ पा रही है।
भूमि के अभाव में अटका निर्माण
माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल सती के अनुसार, इन विद्यालयों के लिए अभी तक भूमि उपलब्ध नहीं हो पाई है। भूमि उपलब्ध होते ही भवन निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
बजट बड़ा, बुनियादी ढांचा क्यों कमजोर?
जब एक ओर 12 हजार करोड़ रुपये से अधिक का वार्षिक बजट और डिजिटल शिक्षा की आधुनिक योजनाओं का दावा किया जा रहा है, तो दूसरी ओर कई बालिका इंटर कॉलेज प्राथमिक स्कूलों में संचालित होना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बालिका शिक्षा को वास्तव में सशक्त बनाने के लिए डिजिटल पहल के साथ-साथ बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता देना आवश्यक है।