उत्तरकाशी: उत्तराखंड के धराली क्षेत्र में 5 अगस्त 2025 को आई भीषण जलप्रलय को लेकर अब एक बड़ा खुलासा हुआ है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नए अध्ययन में इस आपदा के वास्तविक कारणों को विस्तार से बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार यह आपदा न तो बादल फटने से हुई थी और न ही ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की वजह से, बल्कि एक विशाल बर्फीले खंड के अचानक ढहने से यह त्रासदी घटी।
ISRO Reveals Real Cause Behind Dharali Flood Disaster
इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार श्रीकंठ ग्लेशियर क्षेत्र में मौजूद करीब 0.25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला एक बड़ा आइस-पैच (बर्फ का खंड) अचानक टूटकर नीचे गिर गया। इस हिमखंड का आयतन लगभग 75 हजार घन मीटर था, जिससे करीब 69 लाख किलोग्राम बर्फ तेजी से नीचे की ओर खिसक गई। गिरते समय यह बर्फ घर्षण के कारण पानी में बदलती गई और एक विनाशकारी मलबा-युक्त धारा का रूप ले लिया, जिसने धराली क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया।
मलबा और पानी ने मिलकर बढ़ाई तबाही
जैसे-जैसे यह बर्फ नीचे की ओर बढ़ी, इसकी गति तेज होती गई और इसके साथ खीर गंगा कैचमेंट क्षेत्र का भारी मलबा भी बहकर नीचे आया। इस संयुक्त प्रभाव ने जलप्रलय को और अधिक खतरनाक बना दिया। नतीजतन, पूरी धराली घाटी में भारी तबाही मच गई और बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ।
सैटेलाइट इमेजरी से तैयार की गई पूरी टाइमलाइन
इसरो के वैज्ञानिकों ने मल्टी-टेम्पोरल सैटेलाइट इमेजरी, हाई-रेजोल्यूशन डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEMs) और वीडियो फुटेज के आधार पर इस घटना की विस्तृत टाइमलाइन तैयार की। रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2025 में 5220 मीटर की ऊंचाई पर एक बड़ा आइस-पैच दिखाई दिया था, जो पिछले 15 वर्षों के रिकॉर्ड में पहली बार देखा गया। 12 अगस्त को ली गई तस्वीरों में यह आइस-पैच पूरी तरह गायब मिला और वहां ताजा क्षरण के निशान दिखाई दिए।
बादल फटने और जीएलओएफ की संभावना खारिज
अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि 3 से 5 अगस्त के बीच क्षेत्र में केवल हल्की से मध्यम बारिश हुई थी, जिससे बादल फटने की संभावना नहीं बनती। साथ ही, ऊपरी कैचमेंट क्षेत्र में कोई ग्लेशियल लेक मौजूद नहीं थी, जिससे GLOF की संभावना भी पूरी तरह खारिज हो गई। स्थानीय लोगों द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो में अचानक तेज मलबा-युक्त धारा और उसके बाद धीमे बहाव का पैटर्न देखा गया, जो इस तरह की घटना से मेल खाता है।
क्या होता है आइस-पैच और क्यों है खतरनाक
रिपोर्ट में बताया गया है कि आइस-पैच ग्लेशियर नहीं होता, बल्कि यह बर्फ, फर्न और बर्फीली परतों का स्थिर समूह होता है, जो सामान्यतः बहता नहीं है। लेकिन तापमान बढ़ने पर इसकी ऊपरी परत पिघलने लगती है, जिससे यह कमजोर होकर अचानक टूट सकता है। हिमालय में बढ़ते तापमान और घटती बर्फबारी के कारण ऐसे आइस-पैच तेजी से अस्थिर हो रहे हैं, जो भविष्य में बड़े खतरे का संकेत हैं।
इसरो की चेतावनी: नया उभरता खतरा
इसरो ने इस प्रकार की घटनाओं को “क्रायो-हाइड्रोलॉजिकल खतरा” बताया है और भविष्य में ऐसे जोखिमों की निगरानी को जरूरी बताया है। वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि आइस-पैच की निगरानी को अर्ली वार्निंग सिस्टम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि समय रहते लोगों को सतर्क किया जा सके।
भविष्य के लिए जरूरी कदम
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मानसून के दौरान बादलों के कारण ऑप्टिकल सैटेलाइट से निगरानी मुश्किल हो जाती है, इसलिए रडार सैटेलाइट और ग्राउंड मॉनिटरिंग का संयुक्त सिस्टम विकसित करना आवश्यक है। इसके साथ ही, तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को देखते हुए हिमालयी क्षेत्रों में हर स्तर पर निगरानी बढ़ाना बेहद जरूरी हो गया है।