रुड़की: IIT Roorkee ने पारंपरिक हिमालयी वास्तुकला को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हुए एक अनोखी पहल की है। संस्थान ने एक सदी पुरानी क्षतिग्रस्त गोशाला का पुनर्निर्माण कर उसे आधुनिक रूप दिया है।
IIT Roorkee Revives Himalayan Architecture with Hempcrete Technology
इस परियोजना में हैंपक्रीट पैनलों का उपयोग किया गया, जो कम लागत, टिकाऊ और भूकंपरोधी माने जाते हैं। खास बात यह है कि इस तकनीक से एक पूरा कॉटेज महज 10 घंटे में तैयार किया जा सकता है। इस तरह के निर्माण को ग्रामीण क्षेत्रों में होम-स्टे के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
पौड़ी के गांव में किया गया प्रयोग
संस्थान के ‘गो-हैंप’ स्टार्टअप ने पौड़ी जनपद के यमकेश्वर ब्लॉक के फल्दाकोट गांव में करीब 100 साल पुरानी गोशाला को इस तकनीक से पुनर्निर्मित किया। इसमें पारंपरिक शैली को बरकरार रखते हुए आधुनिक तकनीक का समावेश किया गया।
नम्रता कंडवाल के नेतृत्व में सफलता
इस परियोजना का नेतृत्व वैज्ञानिक-आर्किटेक्ट नम्रता कंडवाल कर रही हैं। उन्हें सतत निर्माण और इको-टूरिज्म में उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा ‘ग्लोबल हाउसिंग टेक्नोलॉजी चैलेंज’ में सम्मानित किया जा चुका है। ‘गो-हैंप’ स्टार्टअप का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। यह हैंप आधारित निर्माण सामग्री विकसित कर रहा है, जिससे रेत खनन और पहाड़ों में ब्लास्टिंग जैसी हानिकारक गतिविधियों को कम किया जा सके। स्टार्टअप का लक्ष्य वर्ष 2030 तक देशभर में 1000 हैंप आधारित भवन तैयार करना है। ये भवन जलवायु-अनुकूल और कम-कार्बन उत्सर्जन वाले होंगे, जो भविष्य के निर्माण का नया मॉडल बन सकते हैं।
नई तकनीक से बदली पुरानी सोच
इस परियोजना में इंटरलॉकिंग हैंपक्रीट पैनल सिस्टम का उपयोग किया गया, जिसे आधुनिक निर्माण तकनीक का बेहतरीन उदाहरण माना जा रहा है। इससे पुराने ढांचों को नए और उपयोगी रूप में बदला जा सकता है।