देहरादून: देहरादून में एक व्यक्ति ने अपने पिता के निधन के बाद नेत्रदान का फैसला लिया, लेकिन डॉक्टरों के गंदे उपकरण और लापरवाही देखकर परिजनों ने प्रक्रिया रोक दी। मामला पुलिस तक पहुंच गया है और जांच जारी है।
Eye Donation Halted Over Unsafe Medical Practices in Dehradun
जानकारी के अनुसार करनपुर निवासी धीरज भाटिया के पिता हरीश चंद भाटिया का शनिवार को निधन हो गया। दुख की इस घड़ी में भी बेटे ने साहस दिखाते हुए अपने पिता की आंखें दान करने का निर्णय लिया, ताकि किसी जरूरतमंद को रोशनी मिल सके। इसके लिए उन्होंने एक निजी मेडिकल कॉलेज अस्पताल से संपर्क किया। सूचना मिलने पर मेडिकल कॉलेज से दो पीजी डॉक्टरों की टीम उनके घर पहुंची। एक ने खुद को नेत्र विभाग का तृतीय वर्ष का छात्र बताया, जबकि दूसरा प्रथम वर्ष का था। डॉक्टरों ने परिजनों से कहा कि प्रक्रिया के दौरान केवल दो लोग ही अंदर रहेंगे और उन्होंने नेत्र निकालने की तैयारी शुरू कर दी।
गंदे एप्रेन और जंग लगे औजार देखकर भड़के परिजन
प्रक्रिया शुरू होते ही परिजनों को कई खामियां नजर आईं। डॉक्टरों की टॉर्च ठीक से काम नहीं कर रही थी, एप्रेन गंदे थे और इस्तेमाल किए जा रहे औजारों पर जंग लगी हुई थी। यह देखकर परिजन नाराज हो गए और उन्होंने तुरंत नेत्रदान की प्रक्रिया रुकवा दी। परिजनों ने आशंका जताई कि ऐसे औजारों से निकाले गए अंग से किसी मरीज को नुकसान हो सकता है। घटना के बाद परिजनों ने पुलिस को सूचना दी और किसी गिरोह के शामिल होने का संदेह जताया। पुलिस मौके पर पहुंची और डॉक्टरों का सत्यापन किया, जिसमें वे सही पाए गए। हालांकि, पुलिस ने इस्तेमाल किए गए औजार जब्त कर लिए और मामले की जांच शुरू कर दी। आगे पढ़िए..
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शिकायतकर्ता ने लगाए गंभीर आरोप
धीरज भाटिया का आरोप है कि बिना वरिष्ठ विशेषज्ञ (प्रोफेसर) की मौजूदगी के ट्रेनी डॉक्टरों द्वारा इस तरह की प्रक्रिया करना गलत है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि डॉक्टर केवल अपनी प्रैक्टिस के लिए यह कार्य कर रहे थे, जो गंभीर लापरवाही है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनोज कुमार शर्मा ने कहा कि यह मामला गंभीर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नेत्रदान जैसी संवेदनशील प्रक्रिया विशेषज्ञ डॉक्टर की निगरानी में ही होनी चाहिए। यदि जंग लगे औजारों का इस्तेमाल हुआ है, तो यह बेहद गंभीर लापरवाही है और संबंधित अस्पताल से जवाब मांगा जाएगा।
पुलिस का बयान
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रमेन्द्र सिंह डोबाल के अनुसार, डॉक्टरों का सत्यापन सही पाया गया है। शिकायतकर्ता को औपचारिक शिकायत सीएमओ को देने के लिए कहा गया है, ताकि मामले की गहन जांच की जा सके। नेत्रदान के दौरान पूरी आंख नहीं, बल्कि सामान्यतः कार्निया (आंख का पारदर्शी हिस्सा) प्रत्यारोपण के लिए लिया जाता है। यह प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील होती है और केवल अधिकृत आई बैंक तथा प्रशिक्षित विशेषज्ञों द्वारा ही की जाती है। मृत्यु के 4 से 6 घंटे के भीतर नेत्रदान की प्रक्रिया शुरू करना जरूरी होता है। इससे पहले मृतक के स्वास्थ्य, संक्रमण और आंखों की स्थिति की जांच की जाती है। स्वजन की लिखित सहमति लेना भी अनिवार्य है।
प्रक्रिया के मुख्य चरण
आंख के आसपास एंटीसेप्टिक से सफाई
स्टेराइल उपकरणों से कार्निया या आंख निकालना
आंख की संरचना को सुरक्षित रखना
कार्निया को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया
निकाले गए कार्निया को विशेष प्रिजर्वेशन मीडियम में रखकर 2-8 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित किया जाता है। इसे सामान्यतः 48 घंटे से लेकर 7 दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है।