उत्तराखंड देहरादूनUnstable Hanging Glaciers Raise Disaster Risk in Uttarakhand

उत्तराखंड में ग्लेशियरों ने दिया रेड सिग्नल, कई इलाकों में तबाही का खतरा; NGT की रिसर्च में वॉर्निंग

National Green Tribunal ने मध्य हिमालय में अस्थिर ग्लेशियरों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। Badrinath समेत कई क्षेत्रों में आपदा का खतरा बढ़ गया है।

Uttarakhand glacier danger: Unstable Hanging Glaciers Raise Disaster Risk in Uttarakhand
Image: Unstable Hanging Glaciers Raise Disaster Risk in Uttarakhand (Source: Social Media)

देहरादून: उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बदलते हिम परिदृश्य ने नई चिंता पैदा कर दी है। ढलानों पर मौजूद “हैंगिंग ग्लेशियर” यानी लटके हुए हिमनद अब अस्थिर हो रहे हैं, जिससे बड़े खतरे की आशंका जताई जा रही है।

ये भी पढ़ें:

National Green Tribunal (NGT) ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे गंभीर पर्यावरणीय जोखिम माना है। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक निगरानी और जोखिम का आकलन नहीं किया गया, तो यह स्थिति बड़े पैमाने पर आपदा में बदल सकती है।

Unstable Hanging Glaciers Raise Disaster Risk in Uttarakhand

अध्ययन के अनुसार Alaknanda River घाटी के कई हिस्सों में ग्लेशियर अस्थिर स्थिति में हैं। खास तौर पर Badrinath, Mana और Hanuman Chatti जैसे क्षेत्र जोखिम वाले माने जा रहे हैं। इन क्षेत्रों में हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिससे खतरे की गंभीरता और बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से पिघलते ग्लेशियर, पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता और भूकंपीय गतिविधियों के कारण कई प्रकार की आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। इनमें हिमस्खलन (एवलांच), अचानक मलबा बहाव और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं शामिल हैं, जो न केवल प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ सकती हैं, बल्कि मानव जीवन और संपत्ति के लिए भी घातक साबित हो सकती हैं।

निर्माण गतिविधियां भी बढ़ा रहीं जोखिम

NGT ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह समस्या केवल प्राकृतिक कारणों तक सीमित नहीं है। पहाड़ों में तेजी से हो रहे सड़क, पुल और अन्य निर्माण कार्य भी इस खतरे को बढ़ा रहे हैं। पर्यावरणीय प्रभावों का पर्याप्त आकलन न होने के कारण इन संवेदनशील क्षेत्रों में असंतुलन पैदा हो रहा है, जो भविष्य में बड़े खतरे का कारण बन सकता है। आगे पढ़िए..

ये भी पढ़ें:

निगरानी और मूल्यांकन पर उठे सवाल

ट्रिब्यूनल ने माना कि वर्तमान निगरानी तंत्र पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिक अध्ययन और जोखिम मूल्यांकन में कमी साफ दिखाई दे रही है। यदि इन क्षेत्रों में समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए NGT ने कई प्रमुख संस्थाओं से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इनमें पर्यावरण मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान शामिल हैं। इन सभी से शपथपत्र के साथ स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है, ताकि आगे की रणनीति तय की जा सके। इस मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त को निर्धारित की गई है। तब तक सभी संबंधित विभागों को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

क्यों है यह मामला बेहद गंभीर?

यह मुद्दा सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि लोगों की सुरक्षा और पूरे क्षेत्र के भविष्य से जुड़ा हुआ है। चारधाम यात्रा मार्ग, स्थानीय गांव और बुनियादी ढांचा—सभी इस खतरे की चपेट में आ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्थिति बड़े स्तर की प्राकृतिक आपदा का रूप ले सकती है।