उत्तरकाशी: उत्तराखंड में हर साल मानसून अपने साथ तबाही की कई तस्वीरें लेकर आता है। कहीं बादल फटते हैं, कहीं भूस्खलन से सड़कें टूट जाती हैं, तो कहीं फ्लैश फ्लड और भूधंसाव लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल देते हैं। राज्य के लगभग सभी जिले किसी न किसी रूप में प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होते रहे हैं, लेकिन हाल ही में हुए एक विस्तृत सर्वे में तीन जिलों को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया है। इनमें उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ शामिल हैं।
Uttarakhand on Alert as 3 Districts Face Highest Disaster Risk
आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक, इन तीनों जिलों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। यही वजह है कि आगामी मानसून को देखते हुए सरकार इन जिलों पर विशेष फोकस कर रही है। सैटेलाइट इमेजरी और ड्रोन सर्वे के जरिए संवेदनशील इलाकों की पहचान कर विस्तृत रणनीति तैयार की जा रही है। हाल ही में किए गए अध्ययन में उन क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है, जहां भारी बारिश या भूगर्भीय गतिविधियों के कारण बड़े खतरे पैदा हो सकते हैं। सैटेलाइट इमेजरी के जरिए यह पता लगाया गया कि किन इलाकों में भूस्खलन, फ्लैश फ्लड और भूधंसाव का सबसे ज्यादा जोखिम है। अब इन क्षेत्रों का ड्रोन सर्वे कराया जाएगा ताकि मानसून शुरू होने से पहले हर संवेदनशील स्थान का बारीकी से अध्ययन किया जा सके। सरकार का उद्देश्य संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में पहले से सुरक्षा उपाय लागू करना है।
उत्तरकाशी: प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र
उत्तरकाशी जिला लंबे समय से प्राकृतिक आपदाओं के लिए संवेदनशील माना जाता रहा है। यहां भूकंप, बादल फटना, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। साल 1991 में उत्तरकाशी में आए 6.8 तीव्रता के भूकंप ने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया था। इस भूकंप में सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी और हजारों मकान क्षतिग्रस्त हो गए थे। कई गांव पूरी तरह तबाह हो गए थे। इसे उत्तराखंड के इतिहास की सबसे भयावह आपदाओं में गिना जाता है। साल 2012 में अस्सी गंगा क्षेत्र में बादल फटने की घटना ने फिर से उत्तरकाशी की संवेदनशीलता को उजागर किया। अचानक आई भीषण बाढ़ में कई गांव तबाह हो गए और कई लोग मारे गए या लापता हो गए।
हर मानसून में बढ़ता खतरा
उत्तरकाशी में मानसून के दौरान सड़कें बंद होना, पहाड़ों से मलबा गिरना, भूस्खलन और नदियों का जलस्तर बढ़ना जैसी घटनाएं आम हो चुकी हैं। हाल ही में धराली क्षेत्र में आई आपदा ने भी भारी नुकसान पहुंचाया था। विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तरकाशी की भौगोलिक स्थिति इसे और ज्यादा संवेदनशील बनाती है। यहां कमजोर चट्टानें, ऊंचे पहाड़ और लगातार भूगर्भीय हलचल आपदाओं के खतरे को बढ़ाते हैं। आगे पढ़िए..
ये भी पढ़ें:
चमोली: ग्लेशियर, भूधंसाव और भूकंप का बड़ा संकट
चमोली जिला भी उत्तराखंड के सबसे संवेदनशील जिलों में गिना जाता है। यहां भूकंप, ग्लेशियर टूटने, भूधंसाव और भूस्खलन जैसी घटनाएं लगातार चिंता का कारण बनी हुई हैं। साल 1999 में आए 6.6 तीव्रता के भूकंप ने चमोली में भारी तबाही मचाई थी। इस आपदा में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और बड़ी संख्या में भवन क्षतिग्रस्त हुए थे। साल 2021 में ऋषिगंगा क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। अचानक आई फ्लैश फ्लड में NTPC और ऋषिगंगा परियोजनाएं तबाह हो गईं थीं। इस हादसे में 200 से ज्यादा लोग मारे गए या आज तक लापता हैं। विशेषज्ञों ने इस घटना को जलवायु परिवर्तन और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों से जोड़कर देखा।
जोशीमठ भूधंसाव बना बड़ी चुनौती
साल 2023 में जोशीमठ (ज्योतिर्मठ) में जमीन धंसने लगी। मकानों और सड़कों में बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं। 800 से ज्यादा घर प्रभावित हुए और सैकड़ों परिवारों को विस्थापित करना पड़ा। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण और भूगर्भीय अस्थिरता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।
चमोली जिले में हर साल मानसून के दौरान बदरीनाथ हाईवे बंद होना, भूस्खलन और सड़कें टूटना जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिससे चारधाम यात्रा भी प्रभावित होती है।
पिथौरागढ़: सीमांत क्षेत्र में बढ़ता आपदा खतरा
नेपाल और चीन की सीमा से लगा पिथौरागढ़ जिला भी आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। साल 2020 में काली नदी में आई बाढ़ ने सीमांत क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई थी। नदी किनारे बसे गांवों और संपर्क मार्गों को गंभीर नुकसान पहुंचा था। मुनस्यारी क्षेत्र में बादल फटने की घटना से कई गांव प्रभावित हुए थे और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना पड़ा था। साल 2024 में बंगापानी क्षेत्र में आई फ्लैश फ्लड में 10 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और कई लोग लापता हो गए थे।
मिलम ग्लेशियर क्षेत्र में लगातार हो रहे बदलाव और बर्फ खिसकने की घटनाओं से जोहार घाटी के गांवों और ट्रेकिंग रूट्स पर खतरा बढ़ता जा रहा है।
आखिर क्यों इतने संवेदनशील हैं ये जिले?
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ की संवेदनशीलता की सबसे बड़ी वजह हिमालय का भूगर्भीय ढांचा है।
हिमालय को तीन प्रमुख टेक्टॉनिक जोन में बांटा गया है:br/>शिवालिक
लेसर हिमालय
केंद्रीय हिमालय
इन क्षेत्रों में मेन फ्रंटल थ्रस्ट (MFT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) और मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) जैसी सक्रिय फॉल्ट लाइनें मौजूद हैं।
MCT जोन बना सबसे बड़ा खतरा
विशेषज्ञों के मुताबिक, मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) सबसे ज्यादा सक्रिय क्षेत्र है। यहां धरती के भीतर ऊर्जा का उत्सर्जन अधिक होता है, जिससे भूकंप, भूगर्भीय हलचल और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ इसी MCT जोन में आते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तराखंड में बारिश का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। अब कम समय में अत्यधिक बारिश, बादल फटना, अचानक बाढ़ और लंबे समय तक बारिश जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तापमान बढ़ने और ग्लेशियर पिघलने से भविष्य में खतरा और गंभीर हो सकता है।
सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग की तैयारी
उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग ने आगामी मानसून को देखते हुए विशेष तैयारी शुरू कर दी है। इसके तहत संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, ड्रोन सर्वे, जिला प्रशासन के साथ समन्वय और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली पर तेजी से काम किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल राहत और बचाव कार्यों से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक योजना बनानी होगी। उन्होंने चेतावनी दी है कि अनियोजित निर्माण, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, नदियों के किनारे अतिक्रमण और बिना वैज्ञानिक अध्ययन के विकास परियोजनाएं इन आपदाओं को और गंभीर बना रही हैं।
भविष्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में बढ़ती आपदाएं केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियों का भी परिणाम हैं। लगातार बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और अनियंत्रित विकास ने हिमालय की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है। अब सबसे बड़ी जरूरत वैज्ञानिक विकास मॉडल, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण नियंत्रण, बेहतर ड्रेनेज सिस्टम, समय पर चेतावनी प्रणाली और स्थानीय लोगों को आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण की है। फिलहाल सरकार आगामी मानसून को लेकर सतर्क दिखाई दे रही है, लेकिन उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ में हर साल आने वाली आपदाएं यह साफ संकेत दे रही हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में और बड़ी त्रासदियों का सामना करना पड़ सकता है।