उत्तराखंड पौड़ी गढ़वालRemembering Veer Chandra Singh Garhwali and Garhwal Rifles

गढ़वालियों ने निहत्थे सिखों पर हथियार उठाने से किया इनकार, खून बहाने को आतुर निहंगों को ये जरूर जानना चाहिए

आज धर्म के नाम पर सिख निहंग गढ़वालियों का खून बहाने को तैयार हैं, लेकिन गढ़वाली वो कौम है जिसने अंग्रेजों से कठोर सजा पाना स्वीकार किया.. लेकिन निहत्थे सिखों पर हथियार उठाने से इनकार कर दिया था..

Peshawar Incident 1930: Remembering Veer Chandra Singh Garhwali and Garhwal Rifles
Image: Remembering Veer Chandra Singh Garhwali and Garhwal Rifles (Source: Social Media)

पौड़ी गढ़वाल: जिन्होंने सिखों को बचाने के लिए डाल दिए हथियार, कबूल की सजा... उन्हें ही ये आज हथियार दिखा रहे हैं। ढोंगी धर्मरक्षकों और सोशल मीडिया पर गढ़वालियों को दिन रात गालियाँ बकने में लगे सिखों को ये वाकया याद रखना चाहिए... भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 23 अप्रैल 1930 एक ऐसी तारीख है जिसे साहस, मानवता और नैतिक मूल्यों की मिसाल के रूप में पूरी दुनिया में आज भी याद किया जाता है।

Peshawar Incident 1930: Remembering Veer Chandra Singh Garhwali and Garhwal Rifles

उस दिन तत्कालीन ब्रिटिश भारत के पेशावर स्थित किस्सा ख्वानी बाज़ार में हजारों निहत्थे सिख प्रदर्शनकारी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने सेना को भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया, लेकिन हवलदार मेजर वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली और रॉयल गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया।

क्या था पेशावर कांड?

23 अप्रैल 1930 को खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) के नेतृत्व वाले खुदाई खिदमतगार आंदोलन के समर्थक पेशावर के किस्सा ख्वानी बाज़ार में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। गफ्फार खान की गिरफ्तारी के बाद विरोध प्रदर्शन तेज हो गया। ब्रिटिश प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए सेना तैनात की और बाद में गोलीबारी हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए। विभिन्न स्रोतों में मृतकों की संख्या अलग-अलग बताई गई है।

गढ़वालियों का ऐतिहासिक निर्णय

इसी दौरान हवलदार मेजर वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों को भी निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया गया।
इतिहास की कई किताबों में दर्ज विवरणों के अनुसार उन्होंने रॉयल गढ़वाल राइफल्स के अपने साथियों सहित इस आदेश को मानने से साफ़ इनकार कर दिया। उनका मानना था कि निहत्थे और शांतिपूर्ण सिख नागरिकों पर गोली चलाना सैनिक धर्म और मानवता दोनों के विरुद्ध है। यह निर्णय आज तक किसी भी सैन्य इतिहास में नैतिक साहस का अद्वितीय उदाहरण माना जाता है।
महत्वपूर्ण तथ्य: कई सोशल मीडिया पोस्टों में यह दावा किया जाता है कि आदेश विशेष रूप से "सिखों और उनके परिवारों" पर गोली चलाने का था। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, प्रदर्शनकारी मुख्यतः खुदाई खिदमतगार आंदोलन से जुड़े निहत्थे सिख नागरिक थे।

कोर्ट मार्शल और लंबी कैद

ब्रिटिश सरकार ने वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों को कठोर दंड दिया। उन्होंने वर्षों तक जेल में रहकर भी कभी अपने निर्णय पर कभी पछतावा नहीं किया। इतिहासकारों के अनुसार पेशावर कांड केवल ब्रिटिश दमन की कहानी नहीं, बल्कि गढ़वालियों के नैतिक साहस की भी मिसाल है। गढ़वाल राइफल्स के जवानों ने पूरी दुनिया को बताया कि एक सैनिक का कर्तव्य केवल आदेश का पालन करना नहीं, बल्कि मानवता और न्याय के मूल्यों का सम्मान करना भी है।

आज की स्थिति-

एक ओर “हम निहत्थे सिखों पर गोली नहीं चलाएँगे।”... कहकर अंग्रेजों की कठोर सजा कबूल करने वाले गढ़वाली, और एक तरफ आज अपनी हर सांस में गढ़वालियों के लिए नफरत लिए सिख.. इन्हें जानना चाहिए कि इनके निहत्थे दादा-परदादाओं, माओं-बहनों पर हथियार उठाने की जगह गढ़वाली वीरों ने इंसानियत चुनी थी। और उस इंसानियत को दुश्मन के साथ-साथ पूरी दुनिया ने सलाम किया था। इनसे पूछना चाहिए कि हथियार लेकर अपनी वीरता का सर्टिफिकेट लेकर चल रहे ये लोग किस वीरता की बात करते हैं ? सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट नहीं बची, जहां ये कथित "वीर", माओं-बहनों के लिए गालियाँ दे-देकर अपनी वीरता का परिचय नहीं दे रहे।

जिन्होंने सिखों को बचाने के लिए डाल दिए हथियार, उन्हें ही दिखा रहे हथियार

आज यदि कोई गढ़वालियों को केवल उनकी पहचान के आधार पर गालियाँ देता है या हथियारों का रौब दिखता है, तो उसे इतिहास याद रखना चाहिए। उसे याद रखना चाहिए कि जिस धरती ने उनके पूर्वजों को बचाने की खातिर वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली और रॉयल गढ़वाल राइफल्स जैसे सैनिक दिए, उस धरती के लोगों का सम्मान करना उनका कर्तव्य है। कम से कम अपना इतिहास जानो और उससे कुछ सीखो।