रुद्रप्रयाग: गढ़वाल के तृतीय केदार तुंगनाथ और चोपता घाटी में अनियंत्रित पर्यटन, प्लास्टिक कचरे और जलवायु परिवर्तन के कारण बुग्यालों और वन्यजीवों पर गंभीर संकट गहराने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो हिमालय की जैव विविधता को बड़ा नुकसान हो सकता है।
Tungnath-Chopta Under Threat as Pollution and Tourism Rise
उत्तराखंड के गढ़वाल में स्थित तुंगनाथ मंदिर और चोपता घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं, लेकिन बढ़ती भीड़, प्लास्टिक कचरे और अनियंत्रित पर्यटन से इस संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र का पर्यावरण लगातार प्रभावित हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार लगातार बढ़ते पर्यटन और जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमालय के प्रसिद्ध बुग्याल (ऊंचाई वाले घास के मैदान) तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। इन घास के मैदानों में अब प्लास्टिक रैपर, बोतलें और अन्य कचरा बड़ी मात्रा में दिखाई देता है। कई स्थानों पर अस्थायी शौचालयों से निकलने वाला गंदा पानी भी बुग्यालों और प्राकृतिक जल स्रोतों तक पहुंच रहा है, जिससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है।
हिमालयन मोनाल सहित कई प्रजातियों पर खतरा
चोपता घाटी हिमालयन मोनाल, हिमालयी थार और रेड फॉक्स जैसी दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों का महत्वपूर्ण आवास है। स्थानीय लोगों का कहना है कि लगातार बढ़ती भीड़ और मानवीय गतिविधियों के कारण इन जीवों का प्राकृतिक व्यवहार प्रभावित हो रहा है। कई बार पर्यटक निर्धारित ट्रैक छोड़कर सीधे घास के मैदानों में चलने लगते हैं, जिससे वनस्पतियों और पक्षियों के घोंसलों को नुकसान पहुंचता है। आगे पढ़िए..
ये भी पढ़ें:
प्रजनन काल में बढ़ती भीड़ बनी चिंता
स्थानीय पुजारियों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार हर वर्ष लगभग 5 से 6 लाख श्रद्धालु और पर्यटक तुंगनाथ क्षेत्र पहुंचते हैं। चिंता की बात यह है कि पर्यटन का सबसे व्यस्त समय हिमालयन मोनाल और अन्य पक्षियों के प्रजनन काल से मेल खाता है। इस दौरान शोर, भीड़ और प्राकृतिक आवास में हस्तक्षेप उनके प्रजनन चक्र को प्रभावित करता है।
हेलीकॉप्टर और वाहनों के शोर का भी असर
शोधकर्ताओं का कहना है कि वाहनों, पर्यटकों और हेलीकॉप्टरों के शोर से हिमालयन मोनाल जैसे पक्षियों के प्राकृतिक संचार (कम्युनिकेशन) में बाधा आती है। विशेषज्ञों के अनुसार साथी को आकर्षित करने के लिए पक्षियों को सामान्य से अधिक आवाज लगानी पड़ती है, जिससे उनकी ऊर्जा खर्च होती है और प्रजनन क्षमता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
'बीयर बॉटल पर्यटन' और प्लास्टिक प्रदूषण नई चुनौती
पर्यावरणविदों का कहना है कि कुछ पर्यटक शराब की बोतलें, प्लास्टिक पैकेट और अन्य कचरा खुले में छोड़ देते हैं, जिससे वन्यजीवों का व्यवहार भी बदल रहा है। कुछ मामलों में पक्षियों को मानव खाद्य पदार्थ खाते हुए भी देखा गया है, जो उनके स्वास्थ्य और प्राकृतिक खानपान के लिए नुकसानदायक माना जाता है।
विशेषज्ञों ने सुझाए समाधान
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इस संवेदनशील क्षेत्र को बचाने के लिए कई ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है—
ट्रेक मार्गों पर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर सख्त नियंत्रण।
पर्यटकों के लिए "कचरा वापस लाओ" (Carry Back Waste) जैसी व्यवस्था।
बुग्यालों में अनियंत्रित आवाजाही पर रोक।
स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी।
पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान।
ट्रेकिंग और कैंपिंग गतिविधियों के लिए सख्त नियमों का पालन।