उत्तरकाशी: उत्तराखंड में धराली जैसी आपदा की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सीमांत पर्वतीय जिलों में संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान की गई है। चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में किए गए डेब्रिस फ्लो पोटेंशियल यानी संभावित मलबा प्रवाह के आकलन में कुल 49 संवेदनशील स्थान सामने आए हैं। इन स्थानों पर भारी बारिश, भूस्खलन, ग्लेशियर, प्राकृतिक ड्रेनेज और बड़े कैचमेंट एरिया जैसी परिस्थितियों के चलते भविष्य में अचानक तेज मलबा प्रवाह होने की आशंका जताई गई है।
49 High-Risk Spots Identified in Uttarakhand
सर्वे में चिन्हित 49 स्थानों को खतरे की संभावना के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है। जिनमें 11 स्थान हाई रिस्क, 30 स्थान मीडियम रिस्क और 8 स्थान लो रिस्क में शामिल हैं। इस आकलन में जियो-स्पेशियल मैपिंग के जरिए भौगोलिक स्थिति, पुराने लैंडस्लाइड, ग्लेशियर, ड्रेनेज चैनल, कैचमेंट एरिया, आबादी और सड़क-पुल जैसी आधारभूत संरचनाओं का अध्ययन किया गया है।
चमोली में सबसे ज्यादा संवेदनशील क्षेत्र
तीनों जिलों में सबसे अधिक 22 संवेदनशील स्थान चमोली में सामने आए हैं। इनमें हनुमान चट्टी, जालम, पुलना और घस्तोली को हाई रिस्क कैटेगरी में रखा गया है। इन क्षेत्रों में आबादी के साथ सड़क और पुल जैसी महत्वपूर्ण संरचनाएं भी मौजूद हैं। हनुमान चट्टी, जालम और घस्तोली के आसपास ग्लेशियर, भूस्खलन और बारहमासी ड्रेनेज की स्थिति दर्ज की गई है। पुलना में बड़े कैचमेंट एरिया के साथ ग्लेशियर, लैंडस्लाइड और बारहमासी ड्रेनेज मौजूद होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। चमोली में चाई-जोशीमठ, सुराही थोटा, पांडुकेश्वर, घांघरिया, बदरीनाथ, प्राणमती गाड़, चेपड़ों, कोठी, मलारी, रेवड़ चक कुरकुटी, मंडल, द्रोणागिरी, अरुरही पटुरी और गौणा को मीडियम रिस्क में रखा गया है। वहीं मलकोट, धुनार घाट, त्रिकोट और गौचर लो रिस्क श्रेणी में हैं।
बदरीनाथ यात्रा मार्ग पर भी चिंता
रिपोर्ट में कई संवेदनशील स्थान बदरीनाथ धाम और सीमांत क्षेत्रों की ओर जाने वाले महत्वपूर्ण मार्गों से जुड़े हैं। ऐसे में संभावित मलबा प्रवाह की स्थिति में केवल प्राकृतिक नुकसान ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजमार्ग, पुल, सड़क संपर्क और तीर्थयात्रा मार्ग भी प्रभावित हो सकते हैं। रिपोर्ट में हनुमान चट्टी और ओथ गांव का विस्तृत उदाहरण भी दिया गया है। यहां पुराने भूस्खलन के निशान और संभावित फ्लो पाथ को मैप किया गया है। ओथ गांव को हाई रिस्क जोन के तौर पर चिन्हित करते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग कॉरिडोर के लिए जोखिम का उल्लेख किया गया है। आगे पढ़िए..
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उत्तरकाशी में 11 संवेदनशील स्थान
उत्तरकाशी में कुल 11 स्थान संभावित डेब्रिस फ्लो के खतरे वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किए गए हैं। इनमें स्याना चट्टी को हाई रिस्क कैटेगरी में रखा गया है। मीडियम रिस्क में जानकीचट्टी, पालीगाड़, हर्षिल, झाला, गणेशपुर, गंगोरी और लदाड़ी शामिल हैं। वहीं कुथनौर, खरसाली और गंगोत्री को लो रिस्क में रखा गया है। स्याना चट्टी में राष्ट्रीय राजमार्ग, पुल और आबादी के साथ लैंडस्लाइड और ड्रेनेज का खतरा दर्ज किया गया है। जानकीचट्टी में भी सड़क, पुल और आबादी के साथ ग्लेशियर, भूस्खलन और ड्रेनेज जैसी परिस्थितियां मौजूद हैं।
पिथौरागढ़ में 16 जगहें संवेदनशील
पिथौरागढ़ में कुल 16 संवेदनशील स्थान सामने आए हैं। इनमें सोबला, दाफा, सुवा, सुंडुंग, धुनामानी और गलाती को हाई रिस्क कैटेगरी में रखा गया है। मीडियम रिस्क वाले स्थानों में रौंग कोंग, बारम, सेरा, मदकोट, नाभीढांग, नाभी, नियो, बुरफू और मालपा शामिल हैं। तांगा को लो रिस्क कैटेगरी में रखा गया है। इन क्षेत्रों में भी आबादी, सड़क, पुल, कैचमेंट एरिया, ग्लेशियर, लैंडस्लाइड और ड्रेनेज जैसी स्थितियों को जोखिम आकलन में शामिल किया गया है।
पुराने भूस्खलन और संभावित फ्लो पाथ भी किए गए मैप
सर्वे की खास बात यह है कि संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान केवल सामान्य भौगोलिक आंकड़ों के आधार पर नहीं की गई। रिपोर्ट में पुराने लैंडस्लाइड स्कार, मोरेन डिपॉजिट, टो-इरोजन और संभावित फ्लो पाथ जैसी स्थितियों को भी दर्ज किया गया है। चमोली के पातुरी गांव में पहाड़ी क्षेत्र में जमा मोरेन और संभावित मलबा प्रवाह के रास्ते को मैप किया गया है। फील्ड विजिट के दौरान ली गई तस्वीरों में गांव, अलकनंदा नदी, राष्ट्रीय राजमार्ग और संभावित फ्लो पाथ को भी दर्शाया गया है।
जिलाधिकारियों को दिए गए आगे की कार्रवाई के निर्देश
उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सचिव विनोद सुमन के अनुसार, चिन्हित सभी स्थानों की जानकारी जिलाधिकारियों के साथ साझा की गई है। जिलों को इन क्षेत्रों में रिस्क असेसमेंट कर धरातल की वास्तविक स्थिति की जानकारी जुटाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही संभावित खतरे को कम करने के लिए मिटिगेशन उपायों की रिपोर्ट तैयार कर यूएसडीएमए को भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अब चुनौती खतरा कम करने की
49 संवेदनशील स्थानों की पहचान के बाद सबसे बड़ी चुनौती इन क्षेत्रों में समय रहते प्रभावी कार्रवाई की है। खासकर 11 हाई रिस्क स्थानों पर प्रशासन को निगरानी, चेतावनी प्रणाली, सड़क-पुलों की सुरक्षा और आबादी की सुरक्षा को लेकर ठोस कदम उठाने होंगे। धराली जैसी आपदा ने दिखाया है कि पहाड़ों में अचानक आने वाला मलबा और पानी बेहद कम समय में बड़े इलाके को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में इन 49 स्थानों की पहचान संभावित खतरे का महत्वपूर्ण नक्शा है, लेकिन असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हाई और मीडियम रिस्क वाले क्षेत्रों में आपदा से पहले जोखिम कम करने के लिए कितनी प्रभावी कार्रवाई की जाती है।