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Image: Kabootari devi admitted in hospital

उत्तराखंड की पहली लोकगायिका अस्पताल में भर्ती..आज दुआ करें कि वो सलामत रहें

उत्तराखंड की पहली लोकगायिका अस्पताल में भर्ती..आज दुआ करें कि वो सलामत रहें

1970-80 के दशक की बात है। नजीबाबाद और लखनऊ आकाशवाणी से कुमाऊंनी गीतों का एक कार्यक्रम प्रसारित होता था। एक खनकती आवाज हर किसी के जेहन में जरुर होगी। वो हाई पिच पर “आज पनि झौं-झौ, भोल पनि झौं-झौं, पोरखिन त न्है जूंला” गीत गाती थीं और लो पिच पर “पहाड़ों को ठण्डो पाणि, कि भलि मीठी बाणी” गाती थीं। उत्तराखण्ड की तीजन बाई कही जाने वाली श्रीमती कबूतरी देवी जी। आज वो कबूतरी देवी जी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही हैं। उन्हें सांस लेने और दिल में समस्या के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों की देखरेख में उनका इलाज चल रहा है। बताया जा रहा है कि 73 साल की कबूतरी देवी जी को सांस लेने में परेशानी हो रही थी। इसलिए अब इस लोकगायिका को इमरजेंसी में रखा गया था।

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राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित लोकगायिका कबूतरी देवी के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी मिलने के बाद लोक संस्कृति पर कार्य कर रहे कई लोगों ने अस्पताल पहुंचकर उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की। कबूतरी देवी मूल रुप से पिथौरागढ़ के मूनाकोट ब्लाक के क्वीतड़ गांव की निवासी हैं। इस गांव तक पहुंचने के लिए आज भी 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। जिस वक्त उत्तराखंड की कोई भी महिला संस्कृतिकर्मी आकाशवाणी के लिये नहीं गाती थीं। उस 70 के दशक में कबूतरी देवी जी ने पहली बार पहाड़ के गांव से स्टूडियो पहुंचकर रेडियो जगत में अपने गीतों से धूम मचा दी थी। कबूतरी देवी जी ने जो भी गीत गाये वे दादी-नानी से विरासत में मिले प्रकृति से संबंधित लोकगीत थे।

पहाड के आम जनमानस में बसे लोकगीतॊं को पहली बार बाहर निकालने का श्रेय भी कबूतरी देवी जी को जाता है। आकाशवाणी के लिये कबूतरी देवी जी ने करीब 100 से ज्यादा गीत गाये हैं। 1970-80 के दशक में कबूतरी देवी जी के गीत आकाशवाणी के रामपुर, लखनऊ, नजीबाबाद और चर्चगेट, मुंबई के केन्द्रों से प्रसारित हुए थे। उन दिनों कबूतरी देवी को एक गीत की रिकॉर्डिंग के लिए 25 से 50 रुपये मिलते थे। पति की मृत्यु के बाद कबूतरी देवी जी ने आकाशवाणी के लिये गाना बन्द कर दिया था। इस बीच इनका एक मात्र पुत्र पहाड़ की नियतिनुसार पलायन कर गया और शहर का ही होकर रह गया। लेकिन पहाड़ को मन में बसाये कबूतरी जी को पहाड से बाहर जाना गवारा नहीं था। वो यहीं रही और पहाड़ की सेवा की। अब ये महान गायिका अस्पताल में भर्ती हैं। दुआ कीजिए।

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