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Image: Student of timli vidhyapeeth live interaction with astronaut

Video: पहाड़ के लिए ऐतिहासिक पल..छात्रों ने अंतरिक्ष में मौजूद यात्री से बात की

Video: पहाड़ के लिए ऐतिहासिक पल..छात्रों ने अंतरिक्ष में मौजूद यात्री से बात की

पौड़ी के द्वारीखाल ब्लॉक का तिमली गांव..यहां एक स्कूल है तिमली विद्यापीठ। यकीन मानिए अगर आपको अपने बच्चों को पहाड़ में ही अच्छी शिक्षा देनी है तो एक बार इस स्कूल में जरूर आइए। आपको अहसास होगा कि कड़ी मेहनत के जरिए ये सब कुछ संभव है। सबसे पहले हम धन्यवाद करना चाहेंगे आशीष डबराल का। आशीष डबराल ने एक वीरान पड़े स्कूल की हालत बदली, वहां बच्चों को आधुनिक सुविधाओं से लैस माहौल दिया। फर्राटा अंग्रेजी बोलने वाले ये छात्र हर तरह की शिक्षा में माहिर हो रहे हैं। आज इस स्कूल की गिनती उत्तराखंड के टॉप स्कूलों में की जाए तो गलत नहीं होगा। इस स्कूल का नाम है तिमली विद्यापीठ। इस स्कूल में आसपास के पांच स्कूल के छात्रों ने अंतरिक्ष में मौजूद रिकी अर्नाल्ड से बातचीत की है। छात्रों ने रिकी अर्नाल्ड से करीब 10 मिनट तक लाइव बातचीत की है। बताइए पहाड़ की शिक्षा व्यवस्था के लिए इससे गौरवशाली पल क्या होगा ? हम आपको इसका वीडियो भी दिखा रहे हैं।

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रिकी अर्नाल्ड ने छात्रों से अपने अनुभव साझा किए और कहा कि अंतरिक्ष में जीवन रफ्तार भरा है। यहां काम के बीच वक्त बेहद जल्दी बीत जाता है। एक छात्र ने सवाल किया कि अंतरिक्ष का कूड़ा कहां जाता है? रिकी अर्नॉल्ड ने जवाब दिया कि अंतरिक्ष में कूड़ा ना फैले, इस बात का खास ध्यान दिया जाता है। बच्चों को सबसे ज्यादा उत्सुकता एलियन को लेकर थी। उन्होंने अंतरिक्ष में मौजूद अर्नाल्ड से पूछा कि क्या उन्हें वहां एलियन नजर आए ? को अर्नाल्ड ने जवाब दिया कि उन्होंने किसी भी एलियन को नहीं देखा, अगर दिखा तो जरूर बताएंगे। अर्नाल्ड ने इन छात्रों को बताया कि अंतरिक्ष से दुनिया बेहद खूबसूरत नज़र आती है। तिमली विद्यापीठ के संस्थापक आशीष डबराल के मुताबिक ये लंबी कोशिशों का नतीजा है कि छात्र आज अंतरिक्ष में मौजूद यात्री से बातचीत कर रहे हैं।

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इस कार्यक्रम को आयोजित करने में ARISS संस्था और NASA का सहयोग रहा। इस कार्यक्रम में राजकीय इन्टर कॉलेज चेलुसैंण, राजकीय इन्टर कॉलेज देवीखेत, सरस्वती शिशु मंदिर, सरस्वती विद्या मन्दिर, तिमली विद्यापीठ और आदर्श बाल भारती चेलुसैंण के छात्रों ने प्रतिभाग किया। यहां तक कि यूरोप के कई हिस्सों में इस बातचीत को एफएम में भी सुना गया। आशीष डबराल ने दादा ने 1882 में एक स्कूल खोला था। बीच में तो ये स्कूल ठीक ठाक चला लेकिन एक वक्त ऐसा आया कि पलायन की वजह से यहां सिर्फ 3 छात्र रह गए। इस स्कूल को तिमली विद्यापीठ नाम दिया गया है। आशीष ने मन में संकल्प लिया कि चाहे कुछ हो जाए, इस स्कूल के सम्मान को एक बार से जीवित करेंगे। उन्होंने स्कूल को ऑनलाइन जोड़ने के लिए इग्लैंड से मदद ली। कुछ संस्थाएं उनके स्कूल के बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाना चाहती हैं। इसके बाद आशीष अपने स्कूल के बच्चों को दिल्ली शहर घुमाने भी ले गए हैं। ताकि बच्चों को ये दिखा सकें कि पहाड़ से पढ़कर आए युवा इन शहरों में कैसे रहते हैं।

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