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Image: Benefits of uttarakhand kandali

पहाड़ का अमृत: मलेरिया, पेट के रोगों का पक्का इलाज है कंडाली..इसमें छुपा है आयरन का भंडार

कंडाली के साग का स्वाद भी गजब है और इसमें पौष्टिक तत्वों का खजाना भी छुपा है। जानिए दो मिनट में

कुदरत ने उत्तराखंड को कुछ बेहतरीन कुदरती नुस्खे दिए हैं। इनमें हर बीमारी का बेहतरीन इलाज कुदरती तरीके से आप कर सकते हैं। इसी कड़ी में आज हम आपको कंडाली यानी सिसूणं के बारे में बता रहे हैं। ये ना सिर्फ आपकी सेहत के लिए रामबाण इलाज है बल्कि स्वाद के मामले में बेहतरीन है। चलिए इस बेजोड़ औषधि के बारे में आपको कुछ खास बातें बताते हैं। आम तौर पर लोग इसे बिच्छू घास के नाम से जानते हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में इसे कंडाली और कुमाऊं क्षेत्र में सिसूंण कहा जाता है। ये उत्तराखंड की परंपरा के साथ भी आगे बढ़ता जा रहा है। लेकिन अब ग्लोबल वॉर्मिंग का असर इस पर गंभीर रूप से पड़ रहा है। ये पौधा अर्टिकाकेई वनस्पति फैमिली का होता है। इसका वास्तविक नाम अर्टिका पर्वीफ्लोरा है। इस पौधे को वैज्ञानिकों ने भी खास महत्व दिया है। अगर आपको शरीर में पित्त दोष की बीमारी है, तो इसका सेवन जरूर करें। पेट की गर्मी को दूर करने की इसमें जबरदस्त क्षमता होती है। इसके साथ ही ये पेट से बनने वाली बीमारियों को दूर कर देती है। इसके और भी गुण हैं। अगर आपके शरीर के किसी हिस्से में मोच आ गई है, तो इसकी पत्तियों के इस्तेमाल से अर्क बनाकर प्रभाविक जगह पर लगा सकते हैं। इससे आपको जल्द ही आराम मिलेगी। इसके साथ ही अगर आपके शरीर में जकड़न महसूस हो रही है, तो इसका साग बनाकर खाएं। इसके साग स्वादिष्ट होता है और उत्तराखंड में लोग इसका सेवन भात के साथ करते हैं।

इसके साथ ही एक्सपर्ट्स का कहना है कि मलेरिया के इलाज के लिए बिच्छू खास बेहतरीन इलाज है। इसका साग बनाकर मलेरिया के मरीज को देना चाहिए। ये मलेरिया के मरीज के लिए एंटीबायोटिक और एंटी ऑक्सीडेंट का काम करता है। इसके अलावा अगर आपका पेट साफ नहीं हो रहा है, तो इसके बीजों का सेवन करें, आपको फायदा मिलेगा। खास बात ये है कि इसमें जबरदस्त मात्रा में आयरन होता है, जो आपके शरीर को और आपकी हड्डियों को मजबूती देने का भी काम करता है। ये पौधा भारत, चीन, यूरोप समेत कई देशों में पाया जाता है। बताया जा रहा ह कि ग्लोबल वार्मिंग और मौसम की मार की वजह से इसका अस्तित्व भी खतरे में हैं। कंडाली की पत्तियों पर छोटे-छोटे बालों जैसे कांटे होते हैं। इसलिए जब भी इसका साग बनाएं तो पहले पत्तियों को अच्छी तरह से उबाल लेना चाहिए। इससे इसकी पत्तियों में मौजूद कांटे अलग हो जाते हैं। इसके साग के साथ झुंगर का मजा लेकिन ये अब गुजरे जमाने की बात हो गई है। आज के दौर में इस बेजोड़ औषधि की ढूंढ खोज और बचाने के तरीकों पर फिर से काम होने लगा है

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