रुद्रप्रयाग: पहाड़ी इलाकों में भालू और गुलदार (तेंदुआ) की बढ़ती सक्रियता अब ग्रामीण जीवनशैली को सीधे तौर पर प्रभावित करने लगी है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई गांवों में शादी-विवाह और अन्य सामाजिक कार्यक्रम अब दिन के उजाले में ही आयोजित किए जा रहे हैं, जबकि रात के समारोह लगभग बंद हो चुके हैं।
Wedding culture changed in the hills of Uttarakhand
विशेषकर चमोली और रुद्रप्रयाग जैसे जिलों के दूरस्थ गांवों में लोग सूर्यास्त के बाद घर से बाहर निकलने से भी डरने लगे हैं। रात में गुलदार, दिन में भालू की आवाजाही से ग्रामीणों की चिंता बढ़ी है। ग्रामीणों के अनुसार, शाम ढलते ही गुलदार की चहल-कदमी शुरू हो जाती है, जबकि दिन में कई बार भालू आबादी वाले इलाकों तक पहुंच जाते हैं। खेतों, रास्तों और जंगल से सटे गांवों में लगातार घटनाएं सामने आने के बाद लोगों ने एहतियातन अपने सामाजिक कार्यक्रमों का समय बदल दिया है।
कभी पूरी रात चलती थी रस्में
स्थानीय निवासी बताते हैं कि पहले बारात रात में निकलती थी, ढोल-दमाऊ बजते थे और पूरी रात रस्में चलती थीं, लेकिन अब बारात दोपहर में आती है और शाम से पहले विदा भी कर दी जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर स्थिति पर जल्द नियंत्रण नहीं हुआ, तो आने वाले समय में शादियों के साथ-साथ त्योहार और मेलों का स्वरूप भी बदल सकता है। आगे पढ़िए...
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बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा बड़ी वजह
ग्रामीणों का कहना है कि सबसे ज्यादा खतरा बच्चों और बुजुर्गों को रहता है। कई गांवों में स्कूल जाने वाले बच्चों को भी समूह में भेजा जा रहा है। शादी समारोह में बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है, ऐसे में किसी भी अप्रिय घटना की आशंका बनी रहती है। इसी डर के कारण-
रात की मंडप और भोजन व्यवस्था बंद कर दी गई
डीजे और संगीत कार्यक्रम दिन में ही निपटाए जा रहे हैं
मेहमानों को सूर्यास्त से पहले वापस भेजा जा रहा है
वन्यजीव मानव संघर्ष बढ़ने से बदली परंपराएं
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों में भोजन की कमी और मानवीय दखल बढ़ने से मानव-वन्यजीव संघर्ष तेज हुआ है। इसका असर अब सिर्फ खेती या पशुपालन तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं पर भी साफ दिखने लगा है। ग्रामीणों ने वन विभाग और जिला प्रशासन से मांग की है कि -
गांवों के आसपास नियमित गश्त बढ़ाई जाए
गुलदार और भालू की गतिविधियों की रियल-टाइम सूचना प्रणाली विकसित की जाए
सोलर लाइट और अलर्ट सिस्टम लगाए जाएं
लोगों का कहना है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने तक दिन में शादी करना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है।
पहाड़ों की बदलती तस्वीर
जहां कभी पहाड़ों में शादी-ब्याह रातभर चलने वाले उत्सव हुआ करते थे, वहीं अब वन्यजीवों के डर ने इन परंपराओं को सीमित कर दिया है। यह बदलाव न सिर्फ सुरक्षा की कहानी कहता है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते मानव-वन्यजीव टकराव की गंभीर चेतावनी भी देता है।