नैनीताल: जनपद नैनीताल की खूबसूरत झील और पहाड़ देश-दुनिया के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, लेकिन अब इसी पहाड़ी शहर की भूगर्भीय स्थिति को लेकर नई चिंता सामने आई है। सितंबर 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, नैनीताल की पहाड़ियों के बड़े हिस्से में भूस्खलन का जोखिम मौजूद है। अध्ययन में 24.9 प्रतिशत क्षेत्र को अत्यधिक और 59.6 प्रतिशत क्षेत्र को मध्यम भूस्खलन जोखिम वाले क्षेत्र के रूप में आंका गया है।
Nainital Faces Rising Landslide Risk, New Study Reveals
अध्ययन में वर्ष 2017 से 2024 के बीच यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Sentinel-1A उपग्रह से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। शोधकर्ताओं ने इन आंकड़ों का Persistent Scatterer Interferometry (PSI) तकनीक से विश्लेषण किया। शोध UPES देहरादून के शोधकर्ताओं और भूविज्ञान विशेषज्ञों से जुड़ा है तथा अध्ययन सितंबर 2026 में Bulletin of Engineering Geology and the Environment में प्रकाशित हुआ। अध्ययन के मुताबिक, नैनीताल के अलग-अलग हिस्सों में जमीन की गति एक जैसी नहीं है। कहीं जमीन नीचे की ओर खिसकने के संकेत मिले हैं तो कुछ इलाकों में जमीन के ऊपर उठने की गतिविधि दर्ज की गई है।
बलियानाला में धंस रही जमीन, शेर-का-डांडा में उठाव
रिसर्च के अनुसार, बलियानाला क्षेत्र में जमीन के धंसने की दर करीब 8 से 10 मिलीमीटर प्रति वर्ष दर्ज की गई। वहीं शेर-का-डांडा क्षेत्र में करीब 6 से 8 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से जमीन के ऊपर उठने के संकेत मिले हैं। बलियानाला लंबे समय से भूस्खलन और भू-धंसाव की संवेदनशीलता के लिए जाना जाता है।
1880 की त्रासदी आज भी नैनीताल के इतिहास का सबसे भयावह अध्याय
नैनीताल में भूस्खलन का इतिहास काफी पुराना है। 18 सितंबर 1880 को हुए विनाशकारी भूस्खलन में 151 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 108 भारतीय और 43 ब्रिटिश नागरिक शामिल थे। भारी बारिश के बाद शेर-का-डांडा की ढलान पर हुए इस बड़े भूस्खलन ने मल्लीताल के कई हिस्सों को प्रभावित किया था। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM) के दस्तावेज के अनुसार, 1880 का भूस्खलन भारी बारिश और भूकंपीय गतिविधि के बाद हुआ था। इस घटना में बड़ी मात्रा में मलबा नीचे आया और कई इमारतें इसकी चपेट में आईं।
1880 के बाद बदला गया नैनीताल का ड्रेनेज सिस्टम
1880 की आपदा के बाद नैनीताल में भूस्खलन के खतरे को कम करने के लिए जल निकासी व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, ढलानों पर ड्रेनेज सिस्टम बनाने और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर नियंत्रण जैसे उपाय सुझाए गए थे।
नैनीताल में भूस्खलन का पुराना इतिहास
नैनीताल में 1880 से पहले भी कई बार भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की गई हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक और आपदा प्रबंधन दस्तावेजों में 1866-67 के भूस्खलन और इसके बाद शेर-का-डांडा क्षेत्र में हुई घटनाओं का उल्लेख मिलता है। 1880 की घटना को नैनीताल की सबसे विनाशकारी भूस्खलन घटनाओं में गिना जाता है।
नई रिसर्च क्यों है अहम?
नई सैटेलाइट आधारित रिसर्च नैनीताल की जमीन में हो रही धीमी गतिविधियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण डेटा उपलब्ध कराती है। हालांकि, अध्ययन में दर्ज जमीन की गति को अपने आप में 1880 जैसी किसी नई त्रासदी की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। यह डेटा संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी और जोखिम को समझने के लिए उपयोगी संकेत देता है। इसलिए नैनीताल जैसे संवेदनशील पहाड़ी शहर में नियमित भूगर्भीय निगरानी, वैज्ञानिक आकलन और आपदा प्रबंधन की तैयारियां महत्वपूर्ण बनी हुई हैं।