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Image: Uttarakhand martyr rajendra singh bungla story

देवभूमि का सपूत..कल दिवाली की छुट्टी पर घर आना था, वो तिरंगे में लिपटकर आया

उत्तराखंड ने अपना लाल खो दिया। उसे कल दिवाली की छुट्टियों पर घर आना था। लेकिन वो देश के लिए शहीद हुआ और तिरंगे में लिपटा आया।

उस गांव में आज हर आंख नम हैं, जिस गांव ने अपना लाल खो दिया। दिवाली से ठीक पहले माता-पिता को ऐसी खबर मिली कि उनकी आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं से रहे। दरअसल कल ही उसे दिवाली की छुट्टी पर अपने गांव आना था। पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट का लाल राजेन्द्र सिंह बुंगला तिरंगे में लिपटा हुआ आया। शहादत से दो दिन पहले ही राजेन्द्र ने अपने दोस्त से फोन पर बात की थी और कहा था कि इस बार दिवाली पर घर आ रहा हूं, जमकर जश्न मनाएंगे। दोस्त ने भी खुशी खुशी राजेन्द्र को परिवार को ये खबर कर दी कि बेटा दिवाली पर घर आ रहा है। घर वालों के चेहरे पर मुस्कुराहट छा गई। लेकिन अगले ही दिन आर्मी मुख्यालय से राजेन्द्र सिंह के परिवार को उनके शहीद होने की खबर मिली। दिल और दिमाग सन्न रह गए।

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शहादत की खबर मिली, तो पूरे गांव में मातम पसर गया है। दिवाली से ठीक पहले घर में उत्सव का माहौल था लेकिन इस बार की दिवाली इस परिवार के लिए काली हो गई। कश्मीर में अलगावादियों के हमले में राजेन्द्र सिंह बुंगला गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इसके बाद उन्हें घायल अवस्था में अस्पताल ले जाया गया लेकिन मौत से जंग लड़ते लड़ते ये वीर जवान शहीद हो गया। राजेन्द्र सिंह बुंगला अपने परिवार के इकलौते बेटे थे। उनकी बड़ी बहन की शादी हो गई है और छोटी बहन ने इंटर पास किया था। इसके अलावा सबसे छोटी बहन 10वीं में पढ़ती है। मां सपना देख रही थी कि घर में बहू आएगी, इसलिए इस बार राजेन्द्र के लिए दुल्हन देखने की भी बात चल रही थी। घर में नया मकान बन रहा था इसलिए पिता भी बेहद खुश थे।

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अब घर का इकलौता चिराग चला गया तो पिता चन्द्र सिंह बुंगला और मां मोहनी देवी का रो-रोकर बुरा हाल है। बुढ़ापे का सहारा भरी जवानी में ही देश के लिए कुर्बान हो गया।संभालें तो किसे संभाले और आंसू पोंछें तो आखिर किसके ? गांव वाले अभी भी परिवार को ढाढ़स बंधाने पर जुटे हैं। बहनों के आंसू नहीं थम रहे और माता-पिता का गला अपने सपूत को याद करते ही रूंध जाता है। घर में खुशी का माहौल था कि दिवाली पर बेटा आ रहा है। राजेंद्र के घर आने की बाट जोह रहे परिजनों को शहादत की सूचना मिली। खुशियां मातम में बदल गई। हम बार आपको ये कहानी इसलिए बता रहे हैं, ताकि इस दिवाली एक दीया उस शहीद के नाम भी जलाएं, जो इस बार घर नहीं आ पाया। देश के लिए कुर्बान हो गया। दीवाली पर एक दीया शहीदों के नाम।

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