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Image: Pahadi house concept stop migration from hilly area

पहाड़ के वीरान घरों को इन दो युवाओं ने बनाया रोजगार का जरिया, सुनसान गांवों में लौटी रौनक

पहाड़ के खंडहर होते घरों के फिर से आबाद होने की उम्मीद जगी है। जिन घरों को लोगों ने शहर की नौकरी के लिए छोड़ दिया था, उन्हीं घरों को उत्तराखंड के दो युवाओं ने रोजगार का जरिया बना दिया है...

उत्तरकाशी में जिन घरों को लोगों ने शहर की नौकरी के लिए छोड़ दिया था, उन्हीं घरों को उत्तराखंड के दो युवाओं ने रोजगार का जरिया बना दिया है। इन युवाओं ने माउंटेन विलेज स्टे नाम की संस्था बनाई है। जो कि उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में एक पुराने घर को संवार रही है। ये दोनों युवा वीरान होते घरों को संवारकर रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं, ताकि पलायन रोका जा सके। माउंटेन विलेज स्टे संस्था ने धराली गांव में एक पुराने वीरान घर को प्रीमियम विलेज स्टे मे तब्दील कर दिया है। जामक गांव के पुराने घरों की सूरत भी संवारी है। इन घरों को होम स्टे के लिए तैयार किया गया है, जनवरी से होम स्टे का संचालन शुरू हो गया है। संस्था दिसंबर 2020 तक 4 प्रीमियम विलेज स्टे और 15 होम स्टे शुरू करने वाली है। जिसका उद्देश्य क्षेत्र में सामुदायिक पर्यटन को बढ़ाना है। आइए अब आपको माउंटेन विलेज स्टे के संस्थापकों के बारे में बताते हैं।

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संस्था के निदेशक विनय केडी हैं। वो पौड़ी के सतपुली के रहने वाले हैं और सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। चाहते तो लाखों के पैकेज वाली जॉब कर सकते थे, पर कुछ अलग करने की चाह उन्हें पहाड़ खींच लाई। विनय कहते हैं कि सरकार होम स्टे और सामुदायिक पर्यटन को लेकर कोई मॉडल तैयार नहीं कर पाई। इसीलिए उन्होंने अपने साथी अखिलेश डिमरी के साथ वीरान घरों को संवारने की ठानी। इसी के तहत पहला प्रीमियम विलेज स्टे धराली में 'धराली हाइट्स' नाम से शुरू किया है। जामक गांव में डार्क टूरिज्म की थीम पर पहला होम स्टे भी शुरू हो गया है। जामक गांव साल 1991 की भूकंप त्रासदी का गवाह रहा है। इस मॉडल को बनाने के लिए पहाड़ के इन दोनों युवाओं ने बंगाल, मेघालय और ओडिशा जाकर होम स्टे के बारे में जानकारी जुटाई। संस्था ने पहाड़ में वीरान और खंडहर हो रहे 500 पुराने घरों को चिन्हित किया है। जहां होम स्टे और प्रीमियम विलेज स्टे शुरू किए जाएंगे। इन जगहों पर आने वाले पर्यटकों को उच्च स्तरीय सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। क्षेत्र में पर्यटन के जरिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। जिससे पलायन रुकेगा। साथ ही पहाड़ की लोक संस्कृति भी बची रहेगी। इन दोनों युवाओं के प्रयासों से वीरान होते गांवों में रौनक फिर से लौट आएगी।

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