कुमाऊं में हर दिन डोल रही है धरती, भू वैज्ञानिकों ने की बड़ी तबाही की भविष्यवाणी (Big earthquake predicted in Kumaon)
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कुमाऊं में हर दिन डोल रही है धरती, भू वैज्ञानिकों ने की बड़ी तबाही की भविष्यवाणी

भू वैज्ञानिकों का कहना है कि कुमाऊं के पहाड़ी जिलों में हर रोज भूकंपीय हलचलें हो रही हैं। प्रदेश को अगर भूकंप की तबाही से बचाना है तो पहाड़ों के साथ छेड़छाड़ बंद करनी होगी।

भूकंप की दृष्टि से उत्तराखंड बेहद संवेदनशील है। यहां जमीन के भीतर हो रही हलचल के नतीजे अक्सर सामने आते रहते हैं। कभी पिथौरागढ़, कभी रुद्रप्रयाग तो कभी उत्तरकाशी और चमोली में धरती डोल रही है। हालांकि कम तीव्रता वाले भूकंप से इन इलाकों में कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन अगर आप सोच रहे हैं कि खतरा टल गया है, तो संभल जाइए। भू वैज्ञानिकों का कहना है कि कुमाऊं के पहाड़ी जिलों में हर रोज भूकंपीय हलचलें हो रही हैं। चिंता वाली बात ये है कि अभी छोटे भूकंप के रूप में जमीन के भीतर से बहुत कम ऊर्जा बाहर निकल पा रही है। इस तरह हिमालयी क्षेत्र के भूगर्भ में बड़ी भूकंपीय ऊर्जा जमा हो रही है। जो कभी भी महाभूकंप के रूप में सामने आ सकती है। अगर हमें हिमालयी क्षेत्र को तबाही से बचाना है तो अनियोजित विकास को रोकना होगा। पहाड़ों को तभी छेड़ा जाए, जब इसकी बहुत ज्यादा जरूरत हो।

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कुमाऊं के पिथौरागढ़ और बागेश्वर क्षेत्र में लगातार भूकंप के झटके महसूस किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार कुमाऊं के पहाड़ी जिलों से लेकर नेपाल तक मेन सेंट्रल थ्रस्ट गुजरती है। इसलिए इस क्षेत्र को भूकंपीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील मानते हुए जोन पांच में रखा गया है। यहां हर दिन भूकंपीय हलचलें होती हैं, लेकिन क्योंकि दो रिक्टर स्केल से कम की तीव्रता दर्ज नहीं की जा सकती, इसलिए जमीन के भीतर मची हलचल का पता नहीं लग पाता। मेन सेंट्रल थ्रस्ट प्रदेश के पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा, उत्तरकाशी और चमोली से होकर नेपाल तक गुजरती है। यहां सबसे ज्यादा भूकंपीय हलचलें होती हैं। भू वैज्ञानिक रवि नेगी कहते हैं कि मेन सेंट्रल थ्रस्ट के रूप में पहचानी जाने वाली दरार 2500 किलोमीटर लंबी है। इंडियन और एशियन प्लेट के बीच दबाव, टकराने और घर्षण से भूकंप की घटनाएं होती हैं।

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भू वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। यहां आने वाले छोटे-छोटे भूकंप बड़े भूकंपों की आशंकाओं को रोक देते हैं। ये दबाव को कम कर देते हैं। उत्तरकाशी में साल 1991 और चमोली में साल 1999 में 6 मैग्नीट्यूट तीव्रता से बड़े भूकंप आ चुके हैं। जिनमें जान-माल का भारी नुकसान हुआ था। तब से कोई भी बड़ा भूकंप इस क्षेत्र में नहीं आया। उत्तराखंड भूकंप के लिहाज से जोन 4 और जोन 5 की कैटेगरी में आता है। पिछले एक साल में चमोली, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी और बागेश्वर में कई बार भूकंप के झटके महसूस किए गए। प्रदेश को भूकंप से होने वाली तबाही से बचाना है तो हमें जोन पांच में किसी भी तरह की अनियोजित गतिविधियों को रोकना होगा। विकास के नाम पर पहाड़ों के साथ छेड़छाड़ बंद करनी होगी। ऐसा नहीं किया गया तो प्रदेश में भूकंप से जो तबाही मचेगी, उसका आप और हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते।

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