उत्तराखंड: आप अपने 'नालायक बेटे' को घर से बेदखल कर सकते हैं, राशन कार्ड से नहीं? (Dehradun shafiqe Ahmad ration card case)
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Image: Dehradun shafiqe Ahmad ration card case

उत्तराखंड: आप अपने 'नालायक बेटे' को घर से बेदखल कर सकते हैं, राशन कार्ड से नहीं?

'नालायक बेटे' को घर-जायदाद से बेदखल तो कर सकते हैं मां-बाप लेकिन राशन कार्ड से नहीं

बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसी हफ़्ते दिए एक आदेश में अपने वृद्ध माता-पिता का घर न छोड़ने वाले बेटे-बहू को फटकार लगाते हुए एक महीने के अंदर माता-पिता का फ़्लैट खाली करने का आदेश दिया है. हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में यह भी कहा कि इस लोकोक्ति में सच्चाई ही लगती है कि बेटी हमेशा बेटी होता है लेकिन बेटा शादी तक ही बेटा. अब देहरादून की बात करते हैं. यहां एक वृद्ध पिता अपने बेटे-बहू को अपने राशन कार्ड से 'बेदखल' करवाने के लिए सरकारी दफ़्तर के चक्कर काट रहा है लेकिन अधिकारी कह रहे हैं कि ऐसा नहीं हो सकता. मतलब यह है कि आप अपने 'नालायक' बेटे-बहू को जायदाद से तो बेदखल कर सकते हैं लेकिन राशन कार्ड से नहीं. हो सकता है कि यह आपको भी अजीब लगे लेकिन ये सरकारी नियम कुछ ऐसे बने हैं कि पिता अपने 'नालायक' बेटे को राशन कार्ड से अलग करने के लिए भी उसी पर निर्भर है.
यह मामला देहरादून की भगत सिंह कॉलोनी का है. यहां रहने वाले वरिष्ठ नागरिक शफ़ीक अहमद मेहनत मज़दूरी करके अपना गुज़ारा करते हैं. राशन कार्ड के अनुसार उनके परिवार में उनकी पत्नी खतीजा अंसारी (जिनके नाम पर कार्ड है), बेटा दिलशाद अंसारी और बहू शाहिदा अंसारी के अलावा बेटा इसरार और बेटी रिहाना है. एक बेटी जिसकी शादी हो चुकी है, उसका नाम राशन कार्ड में से कट चुका है.
देहरादून ज़िला आपूर्ति कार्यालय में चक्कर काट रहे शफ़ीक अहमद का कहना है कि उनका बेटा-बहू न उनकी सुनते हैं और न ही उन्हें कोई खर्चा-पानी देते हैं. 60 साल से ज़्यादा की उम्र में भी उन्हें अपना खर्च चलाने के लिए मज़दूरी करनी पड़ रही है. रायपुर क्षेत्र में पड़ने वाली भगत सिंह कॉलोनी के निवासी शफ़ीक यह दरख्वास्त लेकर एक बार फिर ज़िला पूर्ति कार्यालय पहुंचे थे कि उनके बेटे-बहू का नाम राशन कार्ड में से काट दिया जाए क्योंकि उन्हें उनसे कोई मतलब नहीं है. आगे पढ़िए

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कानूनन शफ़ीक अहमद अगर चाहें तो अपने बेटे-बहू को अपनी जायदाद से बेदखल कर कर सकते हैं. शुक्रवार का बॉम्बे हाईकोर्ट का फ़ैसला इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है. यही नहीं वह अगर किराए के मकान में भी रहते हैं तो भी अपने बेटे-बहू को बेदखल कर सकते हैं. लेकिन राशन कार्ड से नाम हटवाने के लिए यह काफ़ी नहीं होगा.जैसा कि शफ़ीक अहमद को रायपुर क्षेत्र प्रभारी ने बताया कि अगर उन्हें अपने बेटे-बहू का नाम राशन कार्ड से हटवाना है तो पहले यह बताना होगा कि अब वह कहां जाएंगे. मतलब यह कि उन्हें इस बात का प्रमाण देना होगा कि बेटे-बहू अब अलग रह रहे हैं और उनका अलग राशन कार्ड बनेगा।
बुजुर्ग शफ़ीक अहमद को यह बात समझ नहीं आती कि क्यों वह अपने जवान, शादीशुदा बेटे को खुद से अलग नहीं कर सकते. उनके साथ आए एक व्यक्ति ने यह भी पूछा कि क्या किसी तरह की उद्घोषणा (स्टैंप पेपर पर शपथ पत्र या अख़बारों में सूचना छपवा कर) से ऐसा किया जा सकता है? जवाब मिला नहीं. शफ़ीक कहते हैं, 'इसका मतलब तो यह हुआ कि राशन कार्ड से नाम हटवाने के लिए भी मैं उनका ही मोहताज हूं. वह क्यों चाहेंगे? वह तो हमें परेशान ही कर रहे हैं.' आगे पढ़िए

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क्षेत्रीय खाद्य अधिकारी अजय रावत कहते हैं कि किसी व्यक्ति के चाहने भर से राशन कार्ड अलग नहीं बन सकते. उन्हें यह प्रमाण देना होगा कि दोनों परिवार अब अलग-अलग रहते हैं. मतलब यह कि राशन कार्ड से नाम कटवाने के लिए बेटे का अलग गैस-बिजली-पानी का कनेक्शन या किरायानामा (मकान-मालिक के साथ किराए का अनुबंध) देना होगा. लेकिन भगत सिंह कॉ़लोनी जैसी बस्ती में न मकान मालिक आसानी से किरायानामा बनाते हैं और न ही बिजली-पानी का बिल देते हैं. इस पर अजय रावत कहते हैं, 'हम क्या कर सकते हैं? हम नियमों में बंधे हैं. आप हमें डॉक्यूमेंट्स दे दें, हम राशन कार्ड बना देंगे.'
उधर शफ़ीक अहमद की परेशानी एक और है. वह कहते हैं कि दसियों चक्कर काट चुके हैं यहां के. मेहनत-मज़दूरी करने वाले आदमी हैं, बताओ यहीं धक्के खाते रहेंगे तो कमाएंगे क्या?
और जिस जवान बेटे से आदमी बुढ़ापे में अपनी देखरेख करने की उम्मीद करता है अगर वही मुंह फेर ले तो... तो भी आप उसे खुद से दूर नहीं कर सकते. कम से कम राशन कार्ड में तो साथ ही रहेगा, जब तक वह न चाहे, तब तक.

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